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Friday, 13 September 2019

Idioms in hindi लोकोक्तियाँ Part - 3

Idioms in Hindi 
लोकोक्तियाँ
Part-3
लोकोक्ति या कहावत |


(121) बगल में छोरा नगर में ढिंढोरा (वस्तु के पास होने पर भी दूर-दूर तक तलाश करना)-दीनदयाल अपनी लड़की की शादी के अवसर पर बैण्ड-बाजे वालों की तलाश में मेरठ गया, जबकि उसके अपने गाँव में अच्छा बैण्ड और सस्ते में मिल गया। मित्रों ने यह कहकर मज़ाक उड़ाया कि 'बगल में छोरा नगर में ढिंढोरा'
(122) बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी (आने वाली मुसीबत से कब तक बचा जा सकता है)-अनेक चोरियों का अभियुक्त दीना एक दिन चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। यह समाचार सुनकर दीना के पड़ोसी ने कहा कि आखिरबकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी।
(123) बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद (किसी चीज के गुणों को जानने वाला उसके महत्त्व को नहीं समझ सकता)-तुम्हारे बाप-दादों ने संस्कृत पढ़ी नहीं, तुम क्या जानो कि संस्कृत साहित्य के अध्ययन में क्या आनन्द मिलता है, क्योंकि कहा गया है 'बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद।
(124) वहम का इलाज तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं (सन्देह करने वाले व्यक्ति को कोई नहीं समझा सकता)-राधा की बिटिया को उल्टी-दस्त करते देख पड़ोसन गीता ने उसे पुदीन-हरा पीने को दिया। राधा बोली! कि इससे मेरी बिटिया ठीक तो हो जाएगी। गीता ने कहा कि तुम्हारे 'वहम का इलाज तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं है।
(125) भागते भूत की लँगोटी ही सही (कुछ मिलने पर जो भी मिला वही अच्छा)-घनश्याम अपना उधार माँगने के लिए दामोदर के यहाँ गया। उसने इधर-उधर की अनेक बातें की लेकिन एक भी पैसा नहीं लौटाया। अन्त में कहा- लो ये 10 किलो आलू ले जाओ, घर पर काम जाएँगे। घनश्याम ने मन में सोचा-चलो ठीक है, 'भागते भूत की लँगोटी ही सही' और आलू उठाकर वापस लौट आया।
(126) भैंस के आगे बीन बजाना (मूर्ख के सामने ज्ञान की बातें करना)-उस मजदूर के सामने शास्त्रों की बातें करना 'भैंस के आगे बीन बजाना' है।
(127) मन चंगा तो कठौती में गंगा (मन की पवित्रता ही सच्ची तीर्थयात्रा है)-क्या रखा है काशी और रामेश्वरम् में ? अपने मन को पवित्र करो तो वहीं काशी के समान है। सन्त रविदास ने कहा भी है कि 'मन चंगा तो कठौती में गंगा'
(128) मान मान मैं तेरा मेहमान (व्यर्थ में गले पड़ना)-कुछ लोगों की ऐसी आदत होती है कि वे मेहमान बनकर धमकते हैं और जबरदस्ती अपनी खातिरदारी करवाकरमान मान मैं तेरा मेहमान' कहावत को चरितार्थ करते हैं।
(129) मुख में राम बगल में छुरी (ऊपर से भला बन कर धोखा देना)–यहाँ तुम रोज मुझसे मीठी-मीठी बातें करते थे और कल तुमने कचहरी में मेरे खिलाफ झूठी गवाही दी। तुम्हारे जैसे लोगों के लिए ही कहा गया है—'मुख में राम बगल में छुरी'
(130) मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक (प्रत्येक व्यक्ति अपनी पहुँच के भीतर ही कार्य करता है)-दारोगा ने करीम से कहा- "मैं जानता था कि तुम चोरी का माल लेकर अकरम के पास ही आओगे; क्योंकि 'मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक' अकरम के अतिरिक्त चोरी के माल का शहर में कोई खरीददार है ही नहीं।
(131) यथा नाम तथा गुण (नाम के अनुरूप गुण)-जब कॉलेज के वार्षिकोत्सव के अवसर पर मीरा ने भजन प्रस्तुत कर श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर दिया तो मुख्य अतिथि को कहना ही पड़ा कि मीरा का गायन उसके 'यथा नाम तथा गुण' को प्रकट करता है।
(132) यथा राजा तथा प्रजा (जैसा स्वामी वैसा सेवक)-आजकल अधिकांश नेता और सरकारी अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इसीलिए छोटे-बड़े सभी व्यापारी भी कर-चोरी करते हैं और 'यथा राजा तथा प्रजा' की कहावत को सार्थक सिद्ध करते प्रतीत होते हैं।
(133) रस्सी जल गयी, ऐंठन गयी (अहित होने पर भी अकड़ का बना रहना)-न्यायालय द्वारा दोषी पाये जाने पर दारोगा जी को सजा हो गयी। जेल में भी वे कैदियों पर अपना रोब झाड़ने लगे। सहसा एक कैदी बोला कि दारोगा जी 'रस्सी तो जल गयी मगर ऐंठन नहीं गयी'
(134) लकीर के फकीर (पुरानी प्रथा पर चलने वाले)-इक्कीसवीं शताब्दी में भी जो लोग किसी बीमारी का इलाज झाड़-फूंक या टोने-टोटके से करते हैं उनको आजकल के समझदार लोग 'लकीर का फकीर' ही कहते हैं।
(135) लातों के भूत बातों से नहीं मानते (नीच व्यक्ति बिना पिटे नहीं मानता)-चोरी की बाबत मुबारक अली झूठ बोलता रहा। जब वह थानेदार द्वारा पीटा गया, तब उसने चोरी की बात कबूल दी। सही ही कहा है किलातों के भूत बातों से नहीं मानते'
(136) लाल गुदड़ी में भी नहीं छिपते (गुणवान हीन दशा में होने पर भी पहचाना जाता है)-निर्धन रामू के होनहार पुत्र ने जब इण्टरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की तो प्रधानाचार्य के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा किलाल गुदड़ी में भी नहीं छिपते'
(137) लोहा लोहे को काटता है (समस्या का समाधान उसी से होता है)-चिकित्सक साँप के जहर का असर समाप्त करने के लिए किसी अन्य साँप के विष का प्रयोग करते हैं। चिकित्सकों का यह कार्य इस कहावत को चरितार्थ करता है कि 'लोहा लोहे को काटता है।
(138) साँप निकल गया लकीर पीटते रहे (खतरा टल जाने पर व्यर्थ उद्योग करना)-चोर चोरी के इरादे से राजेश के घर में कूदे, लेकिन तभी पड़ोसी जाग गये। हो-हल्ला मच जाने पर चोरों को भाग जाना पड़ा। राजेश ने कहा कि हमें रिपोर्ट करनी चाहिए, तब लोगों ने कहा कि भाई, फिलहाल तो साँप निकल गया है, अब क्यों लकीर पीट रहे हो।
(139) सावन के अन्धे को हरा ही हरा सूझता है (स्वार्थी व्यक्ति को अपना ही स्वार्थ दीखता है)-एक कार्यालय में बड़े बाबू की मृत्यु हो जाने पर दूसरा बाबू कहने लगा कि अब इस पद पर मेरी पदोन्नति हो जाएगी। तभी कोई बोल पड़ा—'सावन के अन्धे को हरा ही हरा सूझता है।
(140) सावन हरे भादों सूखे (सदैव एक जैसा)-योगेश बड़ा ही हंसमुख है। उससे जब भी मिलो प्रसन्न ही मिलता है। उसके लिए तो 'सावन हरे भादों सूखे' वाली उक्ति पूर्णतया चरितार्थ होती है।
(141) सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली (जीवन-पर्यन्त पाप कर्म करके अन्त में धर्मात्मा बनने का ढोंग करना)-जीवन भर तो करीम लाला ने डकैतियाँ डाली और हत्याएँ की। बुढ़ापे में अपनी डकैती की कमाई दान कर यश कमाता घूम रहा है। ऐसे ही लोग 'सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली' कहावत को चरितार्थ करते हैं।
(142) सौ सुनार की एकलुहार की (सामान्य मनुष्य बहुत प्रयत्न से जो लाभ पाता है बुद्धिमान थोड़े ही प्रयत्न से वह लाभ पा लेता है)-करोड़ीमल जुम्मन से छोटे-छोटे सामान में रोजाना एक-दो रुपया कमा लेता था। जुम्मन ने 20 बोरी गेहूँ के सौदे में करोड़ीमल से एक ही दिन में ₹ 100 कमा लिए। इसी को कहते हैं—'सौ सुनार की एक लुहार की।
(143) सीधी अँगुली घी नहीं निकलता.(अधिक सज्जन होने से काम नहीं चलता)-हरीश मेरे से उधार लिये रुपये वापस ही नहीं कर रहा था। जब एक दिन मैंने उसे धमकाया तो उसने तुरन्त रुपये वापस कर दिये। किसी ने सही ही कहा है कि सीधी अँगुली घी नहीं निकलता।
(144) हाथ कंगन को आरसी क्या (प्रत्यक्ष को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती)-तुम तो सेंध बनाकर घर में घुसते हुए पकड़े गये हो। तुम्हारे चोर होने में कोई सन्देह नहीं रह गया; क्योंकि कहा गया है-'हाथ कंगन को आरसी क्या'
(145) हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और (कपटपूर्ण व्यवहार)-राधेलाल छोटा कर्मचारी है और बड़ा आदमी बनना चाहता है। उसके व्यवहार में एकरूपता एवं मधुरता नहीं है। उसके जैसे लोगों के लिए ही कहा गया है 'हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और।
(146) होनहार बिरवान के होत चीकने पात (होनहार बचपन से ही दिखाई देने लगता है)-पण्डित जवाहरलाल नेहरू को देखकर एक आकृति-विज्ञानी ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक आगे चलकर देश का कर्णधार बनेगा, इसके लक्षण विलक्षण हैं; क्योंकि 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात'
(147) हल्दी लगेन फिटकरी रंग चोखा (बिना किसी व्यय के कार्य सिद्ध करना)-राम ने श्याम से कहा कि मैं तो ₹ 1000 का माल थोक व्यापारी से उधार लेकर फुटकर ₹ 1200 में नकद बेच देता हूँ और ₹ 200 प्रतिदिन कमा लेता हूँ। इसी को कहते हैं—'हल्दी लगे फिटकरी रंग चोखा'
(148) हाकिम कीअगाड़ी,घोड़े की पिछाड़ी (विपत्ति से बचना चाहिए)-सुरेश थानेदार के पास आये दिन कोई--कोई काम लेकर पहुँच जाया करता था। एक दिन थानेदार किसी बात पर नाराज था, सुरेश के आने पर उसने उसको लॉकअप में बन्द करा दिया। उसी दिन सुरेश की समझ में गया कि 'हाकिम की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी' नहीं करनी चाहिए।