Showing posts with label RRB. Show all posts
Showing posts with label RRB. Show all posts

Sunday, 20 October 2019

Physics ध्वनि (Sound)



ध्वनि


(Sound)


तरंग

"विक्षोभों के प्रतिरूप या पैटर्न जो द्रव्य के वास्तविक भौतिक स्थानांतरण अथवा समूचे द्रव्य के प्रवाह के बिना ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करते हैं, तरंग कहलाते हैं ।"

"तरंग ऊर्जा या विक्षोभों के संचरण की वह विधि है जिसमें माध्यम के कण अपने स्थान पर ही कम्पन करते हैं तथा ऊर्जा एक स्थान से दूसरे स्थान तक आगे जाती है।"

तरंगों के प्रकार

हम विभिन्न आधारों पर तरंगों का वर्गीकरण कर सकते हैं जिसमें से तीन प्रमुख आधार निम्नांकित है-

1. माध्यम के आधार पर

2. माध्यम के कणों के कंपन के आधार

3. ऊर्जा के गमन या प्रवाह के आधार पर

माध्यम के आधार पर (तरंग की प्रकृति के आधार पर) तरंगों के प्रकार

1. प्रत्यास्थ तरंगे 2. विद्युत चुम्बकीय तरंगे

1. प्रत्यास्थ या यांत्रिक तरंगे-

वे तरंगे जिनके संचरण के लिए ठोस, द्रव या गैस जैसे प्रत्यास्थ माध्यम की आवश्यकता होती है, उन्हें प्रत्यास्थ या यांत्रिक तरंग कहते हैं।

1. ये बिना माध्यम के संचरित नहीं हो सकती है।

2. इनका संचरण माध्यम के कणों के दोलनों के कारण संभव हो पाता है।

3. इनका संचरण माध्यम के प्रत्यास्थ गुणों पर निर्भर करता है।

उदाहरण-

1. ध्वनि तरंगे 2. रस्सी या तार में संचरित होने वाली तरंगे

3. पानी में संचरित होने वाली तरंगे 4. भूकंपी तरंगे

2. विद्युत चुम्बकीय तरंगे-

वे तरंगे जिनके संचरण के लिए ठोस, द्रव या गैसीय माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है तथा जो निर्वात में भी गमन कर सकती है, उन्हें विद्युत चुम्बकीय तरंगे कहते हैं।

1. विद्युत-चुंबकीय तरंगों के संचरण के लिए माध्यम का होना आवश्यक नहीं है।

2. इनका संचरण निर्वात में भी होता है। निर्वात में सभी विद्युत-चुंबकीय तरंगों की चाल समान होती है जिसका मान हैः

c = 29,97,92,458 m s-1

उदाहरण-

1. दृश्य प्रकाश 2. अवरक्त किरणें 3. पराबैंगनी किरणें 4. एक्स किरणें

5. गामा किरणें 6. रेडियो तरंगे 7. सूक्ष्म तरंगे

माध्यम के कणों के कंपन के आधार पर तरंगों के प्रकार-

1. अनुप्रस्थ तरंगे 2. अनुदैर्ध्य तरंगे

1. अनुप्रस्थ तरंगे-

यदि माध्यम के कण तरंग की गति की दिशा के लंबवत् दोलन करते हैं तो ऐसी तरंग को हम उसे अनुप्रस्थ तरंग कहते हैं।

उदाहरण -

1. तनी हुई डोरी या तार में कंपन- किसी डोरी के एक सिरे को दीवार से बांध कर उसके दूसरे मुक्त सिरे को बार-बार आवर्ती रूप से ऊपर-नीचे झटका दिया जाए तो इस प्रकार कंपन करती हुई डोरी में इसके कणों के कंपन तरंग की गति की दिशा के लंबवत् होते हैं, अतः यह अनुप्रस्थ तरंग का एक उदाहरण है।

2. पानी की सतह पर बनने वाली तरंगे (लहरे)- पानी में जब लहरे बनती है तक पानी के कण अपने स्थान पर ऊपर नीचे तरंग (ऊर्जा) संचरण के लम्बवत दिशा में कम्पन करते हैं।

2. अनुदैर्ध्य तरंगे-

यदि माध्यम के कण तरंग की गति की दिशा के दिशा में ही दोलन करते हैं तो उसे अनुदैर्ध्य तरंग कहते हैं।

अनुदेर्ध्य तरंगों का संचरण संपीडन तथा विरलन के रूप में होता है।

संपीडन- माध्यम के जिस स्थान पर कण पास पास आ जाते हैं तथा घनत्व अधिक हो जाता हैं, उन्हें संपीडन कहते हैं। संपीडन पर माध्यम का घनत्व तथा दाब अधिकतम होता है।

विरलन- माध्यम के कण जिस स्थान पर दूर-दूर हो जाते हैं तथा घनत्व कम हो जाता हैं, उन्हें विरलन कहते हैं। विरलन पर माध्यम का घनत्व तथा दाब न्यूनतम होता है।

उदाहरण -

1. ध्वनि तरंग- चित्र में अनुदैर्ध्य तरंगों के सबसे सामान्य उदाहरण ध्वनि तरंगों की स्थिति प्रदर्शित की गई है। वायु से भरे किसी लंबे पाइप के एक सिरे पर एक पिस्टन लगा है। पिस्टन को एक बार अंदर की ओर धकेलते और फिर बाहर की ओर खींचने से संपीडन (उच्च घनत्व) तथा विरलन (न्यून घनत्व) का स्पंद उत्पन्न हो जाएगा। यदि पिस्टन को अंदर की ओर धकेलने तथा बाहर की ओर खींचने का क्रम सतत तथा आवर्ती (ज्यावक्रीय) हो तो एक ज्यावक्रीय तरंग उत्पन्न होगी, जो पाइप की लंबाई के अनुदिश वायु में गमन करेगी। स्पष्ट रूप से यह अनुदैर्ध्य तरंग का उदाहरण है।

2. छड़ों में रगड़ के कारण उत्पन्न तरंगे अनुदेर्ध्य होती है।

अनुप्रस्थ तरंगे केवल ठोस में ही संभव है-

यांत्रिक तरंगें माध्यम के प्रत्यास्थ गुणधर्म से संबंधित हैं। अनुप्रस्थ तरंगों में माध्यम के कण संचरण की दिशा के लंबवत दोलन करते हैं, जिससे माध्यम की आकृति में परिवर्तन होता है अर्थात माध्यम के प्रत्येक अवयव में अपरूपण विकृति होती है। ठोसों एवं डोरियों में अपरूपण गुणांक होता है अर्थात इनमें अपरूपक प्रतिबल कार्य कर सकते हैं। तरलों का अपना कोई आकार नहीं होता है इसलिए तरल अपरूपक प्रतिबल कार्य नहीं कर सकते हैं। अतः अनुप्रस्थ तरंगें ठोसों एवं डोरियों (तार) में संभव हैं परन्तु तरलों में नहीं।

अनुदैर्ध्य तरंगे ठोस, द्रव और गैस तीनों ही माध्यम में संभव है-

1. अनुदैर्ध्य तरंगें संपीडन विकृति (दाब) से संबंधित होती हैं। ठोसों तथा तरलों दोनों में आयतन प्रत्यास्थता गुणांक होता है अर्थात ये संपीडन विकृति का प्रतिपालन कर सकते हैं। अतः ठोसों तथा तरलों दोनों में अनुदैर्ध्य तरंगें संचरण कर सकती हैं।

2. वायु में केवल आयतन प्रत्यास्थता गुणांक होता है अर्थात ये संपीडन विकृति का प्रतिपालन कर सकते हैं। अतः वायु में केवल अनुदैर्ध्य दाब तरंगों (ध्वनि) का संचरण ही संभव है।

3. स्टील की छड़ में अनुदैर्ध्य तथा अनुप्रस्थ दोनों प्रकार की तरंगें संचरित हो सकती हैं क्योंकि स्टील की छड़ में अपरूपण तथा आयतन प्रत्यास्थता गुणांक दोनों होता है। जब स्टील की छड़ जैसे माध्यम में अनुदैर्ध्य एवं अनुप्रस्थ दोनों प्रकार की तरंगें संचरित होती हैं तो उनकी चाल अलग-अलग होती है क्योंकि अनुदैर्ध्य एवं अनुप्रस्थ दोनों तरंगें अलग-अलग प्रत्यास्थता गुणांक के फलस्वरूप संचरित होती हैं।

ऊर्जा के गमन या प्रवाह के आधार पर तरंगों के प्रकार

1. प्रगामी तरंगे 2. अप्रगामी तरंगे

1. प्रगामी तरंगें-

वे तरंगें जो माध्यम के एक बिन्दु से दूसरे बिंदु तक गमन कर सकती हैं, उन्हें प्रगामी तरंगें कहते हैं।

1. प्रगामी तरंगे अनुप्रस्थ अथवा अनुदैर्ध्य दोनों प्रकार की हो सकती है।

2. वह द्रव्य माध्यम जिसमें तरंग संचरित होती है, वह स्वयं गति नहीं करता है बल्कि विक्षोभ या ऊर्जा ही आगे बढ़ती है। प्रगामी तरंग में भी विक्षोभ या ऊर्जा का ही संचरण होता है।

उदाहरणार्थ, किसी नदी की धारा में जल की पूर्ण रूप से गति होती है। परन्तु जल में बनने वाली तरंग में केवल विक्षोभ गति करते हैं न कि पूर्ण रूप से जल। इसमें जल केवल ऊपर नीचे कंपन करता है।

इसी प्रकार, पवन के बहने में वायु पूर्ण रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करता है लेकिन ध्वनि तरंग के संचरण में वायु में कंपन होता है और इसमें विक्षोभ (या दाब घनत्व) में वायु में संचरण होता है जिससे संपीडन व विरलन के द्वारा विक्षोभ या तरंग आगे बढ़ती है। अतः हम कह सकते हैं कि ध्वनि तरंग की गति में वायु (माध्यम) पूर्ण रूपेण गति नहीं करता है।

अनुप्रस्थ प्रगामी तरंग के श्रृंग या शीर्ष एवं गर्त-

श्रृंग या शीर्ष - किसी अनुप्रस्थ प्रगामी तरंग में अधिकतम धनात्मक विस्थापन वाले बिंदु को शीर्ष कहते हैं।

गर्त - किसी अनुप्रस्थ प्रगामी तरंग में अधिकतम ऋणात्मक विस्थापन वाले बिंदु को गर्त कहते हैं।

कोई अनुप्रस्थ प्रगामी तरंग कैसे गति करती है-

किसी माध्यम में जब कोई प्रगामी तरंग गति करती है तब माध्यम के कण अपनी माध्य स्थिति के इर्द-गिर्द सरल आवर्त गति (या कंपन) करते हैं तथा माध्यम में श्रृंग (या शीर्ष) और गर्त बनते हैं। विक्षोभ (या तरंग-ऊर्जा) के आगे बढ़ने के साथ-साथ ये श्रृंग या गर्त भी आगे बढ़ते जाते हैं।

2. अप्रगामी तरंगें-

जब विपरीत दिशाओं में गति करती हुई दो सर्वसम तरंगों का व्यतिकरण होता है तो एक अपरिवर्ती तरंग पैटर्न बन जाता है, जिसे अप्रगामी तरंगें कहते हैं। अप्रगामी तरंग में तरंग या ऊर्जा किसी भी दिशा में आगे नहीं बढ़ती है अपितु माध्यम की निश्चित सीमाओं के मध्य सीमित हो जाती है। इसीलिए इन तरंगों को अ-प्रगामी (अर्थात आगे नहीं बढ़ने वाली) कहते हैं।

जैसे किसी डोरी के दोनों सिरों को दृढ़ परिसीमाओं पर बांध देते हैं तथा बाईं ओर के सिरे पर झटका दे कर तरंग बनाते हैं। तब दाईं ओर गमन करती तरंग दृढ़ परिसीमा से परावर्तित होती है। यह परावर्तित तरंग दूसरी दिशा में बाईं ओर गमन करके दूसरे सिरे से परावर्तित होती है। आपतित एवं परावर्तित तरंगों के व्यतिकरण से डोरी में एक अपरिवर्ती तरंग पैटर्न बन जाता है, ऐसे तरंग पैटर्न अप्रगामी तरंगें कहलाते हैं।

अप्रगामी तरंगों के प्रकार-

1. अनुदैर्ध्य अप्रगामी तरंग- जब दो सर्वसम अनुदैर्ध्य प्रगामी तरंगे एक ही सरल रेखा में विपरीत दिशा में चलती हुई अध्यारोपित होती है तो माध्यम में जो तरंग पैटर्न बनता है उसे अनुदैर्ध्य अप्रगामी तरंग कहते हैं।

उदाहरण- वायुस्तम्भ (बंद व खुले ऑर्गन पाइप) में बनने वाली अप्रगामी तरंगे।

अनुप्रस्थ अप्रगामी तरंग- जब दो सर्वसम अनुप्रस्थ प्रगामी तरंगे एक ही सरल रेखा में विपरीत दिशा में चलती हुई अध्यारोपित होती है तो माध्यम में जो तरंग पैटर्न बनता है उसे अनुप्रस्थ अप्रगामी तरंग कहते हैं।

उदाहरण- स्वरमापी के तार या सितार/गिटार के तार में, मेल्डीज के प्रयोग में डोरी में बनाए वाली अप्रगामी तरंगे।

अप्रगामी तरंग बनने के लिए शर्त-

अप्रगामी तरंग आपतित तथा परावर्तित तरंगों के अध्यारोपण से होता है अतः इनके बनने के लिए माध्यम असीमित नहीं होना चाहिए बल्कि माध्यम दो परिसीमाओं में बद्ध होना चाहिए।

तरंगदैर्घ्य

भौतिकी में, कोई साइन-आकार की तरंग, जितनी दूरी के बाद अपने आप को पुनरावृत (repeat) करती है, उस दूरी को उस तरंग का तरंगदैर्घ्य(wavelength) कहते हैं। दीर्घ (= लम्बा) से 'दैर्घ्य' बना है।
तरंगदैर्घ्य, तरंग के समान कला वाले दो क्रमागत बिन्दुओं की दूरी है। ये बिन्दु तरंगशीर्श (crests) हो सकते हैं, तरंगगर्त (troughs) या शून्य-पारण (zero crossing) बिन्दु हो सकते हैं। तरंग दैर्घ्य किसी तरंग की विशिष्टता है। इसे ग्रीक अक्षर 'लैम्ब्डा' (λ) द्वारा निरुपित किया जाता है। इसका SI मात्रक मीटर है।

Friday, 11 October 2019

Physics यांत्रिकी (Mechanics)

यांत्रिकी

(Mechanics)


भौतिक राशियाँ

तिक संबंधी नियमों को- समय, बल, ताप, घनत्व जैसी तथा अन्य अनेक भौतिक राशियों के संबंध सूत्रों के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। सभी भौतिक राशियों को सामान्यत: मूल (लंबाई, द्रव्यमान व समय) एवं व्युत्पन्न (गति, क्षेत्रफल, घनत्व इत्यादि) राशियों में बाँटा जा सकता है।
भौतिक राशियों को को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है:

(1) अदिश (Scalar) (इनमें केवल परिमाण होता है) राशियाँ
(2) सदिश (vector) (इनमें परिमाण व दिशा दोनों होते हैं) राशियाँ।


सदिश राशि

सदिश राशि वैसी भौतिक राशि जिनमें परिमाण के साथ-साथ दिशा भी रहती है और जो योग के निश्चित नियमों के अनुसार जोड़ी जाती हैं, उन्हें संदिश राशि कहते हैं: जैसे- वेग, विस्थपान, बल, त्वरण आदि.

अदिश राशि वैसी भौतिक राशि, जिनमें केवल परिमाण होता है. दिशा नहीं, उसे अदिश राशि कहा जाता है: जैसे - द्रव्यमान, चाल , आयतन, कार्य , समय, ऊर्जा आदि.
नोट: विद्युत धारा (current), ताप (temprature), दाब (pressure) ये सभी अदिश राशियां हैं.

आवृत्ति

कोई आवृत घटना (बार-बार दोहराई जाने वाली घटना), इकाई समय में जितनी बार घटित होती है उसे उस घटना की आवृत्ति (frequency) कहते हैं। आवृति को किसी साइनाकार (sinusoidal) तरंग के कला (phase) परिवर्तन की दर के रूप में भी समझ सकते हैं। आवृति की इकाई हर्त्ज (साकल्स प्रति सेकण्ड) होती है।
एक कम्पन पूरा करने में जितना समय लगता है उसे आवर्त काल (Time Period) कहते हैं।
आवर्त काल = 1 / आवृति
अर्थात, T = 1 / f

आवेग

बल और समयान्तराल के गुणनफल को बल का आवेग कहते हैं।
यदि किसी पिंड पर एक नियम बल F को डेल्टा t समान्तराल के लिए लगाया जाये, तो इस बल का आवेग F * डेल्टा t होगा। आवेग एक राशि है। इसकी दशा वही होगी जो बल की है।
माना कि किसी पिण्ड का द्रव्यमान m है। इस पर नियम बल F को डेल्टा t समान्तराल के लिए लगाने पर वेग में डेल्टा v परिवर्तन हो जाता है। तब न्यूटन के नियमानुसार-

F = m*a = m * डेल्टा v / डेल्टा t
F डेल्टा t = m डेल्टा t
चुकी m डेल्टा v = डेल्टा p
इसलिए F डेल्टा t = डेल्टा p
अतः किसी पिंड को दिया गया आवेग, पिंड में उत्पन्न संवेग–परिवर्तन के बराबर होता है। अतः आवेग का मात्रक भी वही होता है जो संवेग (न्यूटन.सेकेण्ड) का है।

कार्य

साधारण बोलचाल में कार्य का अर्थ है कि शारीरिक अथवा मानसिक क्रिया। जब बल लगने पर वस्तु में गति (विस्थापन) हो तो बल द्वारा कार्य किया जाता है और बल व बल की दिशा में विस्थापन का गुणनफल कार्य को व्यक्त करता है।
कार्य = बल & बल की दिशा में चली गई दूरी।
W = F x d (कार्य का मात्रक जूल है)

शक्ति

कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं,

P =w/t (शक्ति का मात्रक वाट(w) है

भार

किसी वस्तु का भार वह बल है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण उस पर लगता है तथा पृथ्वी के केंद्र की ओर कार्यरत होता है।। जबकि द्रव्यमान वस्तु में निहित पदार्थ की मात्रा का माप है। जब हम कहते हैं कि एक व्यक्ति का वजन 60 किग्रा. है तो वास्तव में हम उसका द्रव्यमान बताते हैं न कि भार।

दाब

प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगे बल को दाब कहते हैं।

दाब का मात्रक न्यूटन प्रति वर्ग मी. अथवा पास्कल है। वायुमंडलीय दाब: पृथ्वी के चारों ओर काफी ऊँचाई तक वायु है जिसे वायुमंडल कहते हैं। वायु का भार होता है अत: यह पृथ्वी की सतह पर ही नहीं, बल्कि पृथ्वी पर स्थित सभी वस्तुओं पर दाब डालती है। वास्तव में, मानव एवं समुद्र की वायुमंडलीय दाब को वायुदाबमापी (barometer) द्वारा मापा जाता है।

ऊर्जा

इसमें न तो द्रव्यमान होता है और न ही यह स्थान घेरती है किन्तु यह समस्त ब्रह्माण्ड में विद्यमान है। ऊर्जा के कारण ही कार्य करने की क्षमता उत्पन्न होती है। कोई भी कार्य बिना ऊर्जा-व्यय के नहीं किया जा सकता है। ऊर्जा कई प्रकार की होती है, जैसे–यांत्रिक, ऊष्मीय, प्रकाशिक, ध्वनि, चुम्बकीय, विद्युत्, नाभिकीय, रासायनिक ऊर्जा इत्यादि।

गुरुत्व

न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के अनुसार दो पिंडो के बीच एक आकर्षण बल कार्य करता है. यदि इनमें से एक पिंड पृथ्वी हो तो इस आकर्षण बल को गुरुत्व कहते हैं. यानी कि, गुरुत्व वह आकर्षण बल है, जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केंद्र की ओर खींचती है. इस बल के कारण जो त्वरण उत्पन्न होती है, उसे गुरुत्व जनित त्वरण (g) कहते हैं, जिनका मान 9.8 m/s^2 होता है.
गुरुत्व जनित त्वरण (g) वस्तु के रूप, आकार, द्रव्यमान आदि पर निर्भर नहीं करता है.

गति

यदि कोई वस्तु अन्य वस्तुओं की तुलना में समय के सापेक्ष में स्थान परिवर्तन करती है, तो वस्तु की इस अवस्था को गति (motion/मोशन) कहा जाता है।

सामान्य शब्दों में गति का अर्थ - वास्तु की स्थिति में परिवर्तन गति कहलाती है।

घनत्त्व

द्रव्यमान/आयतन इसका S.I. मात्रक किलोग्राम मीटर^-3 होता है।

चाल

किसी वस्तु के विस्थापन की दर को चाल कहते हैं। अथार्त चाल = दूरी / समय यह एक अदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक मी/से है।

त्वरण

किसी वस्तु के वेग में परिवर्तन की दर को त्वरण कहते हैं। इसका S.I. मात्रक मी/से2 है। यदि समय के साथ वस्तु का वेग घटता है तो त्वरण ऋणात्मक होता है, जिसे मंदन (retardation ) कहते हैं।

दूरी

किसी दिए गए समयान्तराल में वस्तु द्वारा तय किए गए मार्ग की लंबाई को दूरी कहते हैं। यह एक अदिश राशि है। यह सदैव धनात्मक (+ve) होती हैं।

द्रव्यमान संख्या

द्रव्यमान संख्या परमाणु भार को कहा जाता है। यह प्रोटान और न्यूट्रान की कुल सख्या होती है। यह परमाणु क्रमांक की तरह समान नहीं होता है।

न्यूटन के नियम

color="#000"> "न्यूटन का गति -नियम (newton 's laws of motion ): भौतिकी के पिता न्यूटन ने सन 1687 ई० में अपनी किताब ""प्रिन्सिपिया"" में गति के पहले नियम को प्रतिपादित किया था.

न्यूटन का पहला गति-नियम (newton's first law of motion ): यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है तो वह विराम अवस्था में रहेगी या यदि वह एक समान चाल से सीधी रेखा में चल रही है, तो वैसी हे चलती रहेगी, जब तक उस पर कोई बाहरी बल लगाकर उसकी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन न किया जाए.
प्रथम नियम को गैलिलियो का नियम या जड़त्व का नियम भी कहते हैं.
बाह्य बल के आभाव में किसी वस्तु की अपनी विरामावस्था या समान गति की अवस्था को बनाए रखने की प्रवत्ति को जड़त्व कहते हैं.

प्रथम नियम से बल की परिभाषा मिलती है.
बल की परिभाषा: बल वह बाह्य कारक है जो किसी वास्तु की प्रारम्भिक अवस्था में परिवर्तन करता है या परिवर्तन करने की चेष्टा करता है. बल एक सदिश राशि है. इसका S.I. मात्रक न्यूटन है.
जड़त्व के कुछ उदाहरण: (i) ठहरी हुई मोटर या रेलगाड़ी के अचानक चल पड़ने पर उसमे बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं.
(ii) चलती हुई मोटर कार के अचानक रुकने पर उसमें बैठे यात्री आगे की ओर झुक जाते हैं.
(iii) कंबल को हाथ से पकड़ कर डंडे से पीटने पर धूल के कण झड़कर गिर पड़ते हैं.
संवेग: किसी वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल को उस वस्तु का संवेग कहते हैं. अथार्त् संवेग = वेग x द्रव्यमान
यह एक सदिश राशि है. इसका S.I. मात्रक किग्राम x मी./से. है.

न्यूटन का द्वितीय गति नियम ( newton's second law of motion): किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस वस्तु पर आरोपित बल के समानुपाती होती है. तथा संवेग परिवर्तन की दिशा में होता हैं अब यदि आरोपित बल F, बल की दिशा में उत्पन्न त्वरण a एवं वस्तु का द्रव्यमान m हो, तो न्यूटन के गति के दूसरे नियम से f = ma यानी कि न्यूटन के दूसरे नियम दे बल का व्यंजक प्राप्त होता है.
नोट: प्रथम नियम दूसरे नियम का ही अंग हैं.

न्यूटन का तृतीय गति नियम (newton's third law of motion): प्रत्येक क्रिया के बराबर, परन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है. उदाहरण:
(i) बंदूक से गोली चलाने पर, चलाने वाले को पीछे की ओर धक्का लगना
(ii): नाव से किनारे पर कूदने पर पीछे की ओर हट जाना
(iii): रॉकेट को उड़ाने में.

बल

बल वह बाह्य कारक है जो किसी वास्तु की प्रारम्भिक अवस्था में परिवर्तन करता है या परिवर्तन करने की चेष्टा करता है. बल एक सदिश राशि है. इसका S.I. मात्रक न्यूटन है |

अभिकेन्द्र बल

जब कोई कण एकसमान चाल से वृत्तीय गति करता है तो उसके केन्द्र की ओर एक त्वरण कार्य करता है जिसे उसका अभिकेन्द्र त्वरण कहते हैं। न्यूटन के गति के नियम से कण में त्वरण सदैव बल से ही उत्पन्न होता है तथा बल की दिशा त्वरण के अनुदिश होती है।अतः वृत्तीय गति करने वाले कण पर केन्द्र की दिशा में सदैव एक बल कार्य करता है। इस
बल को अभिकेन्द्र बल कहते हैं। किसी कण की वृत्तीय गति के लिए इस बल का उस पर लगा होना आवश्यक है।

मात्रक

किसी भौतिक राशि का मापन करने के लिए हम इस राशि की तुलना एक निश्चित, आधारभूत, यादृच्छिक रूप से चुने गए मान्यता प्राप्त, संदर्भ-मानक से करते हैं। इस संदर्भ-मानक को मानक मात्रक कहते हैं।

भौतिक राशि का परिमाण-

किसी भी भौतिक राशि की माप को मात्रक के आगे एक आंकिक संख्या लिखकर व्यक्त किया जाता है। इसे उस भौतिक राशि का परिमाण कहते हैं।

मूल मात्रक-

यद्यपि हमारे द्वारा मापी जाने वाली भौतिक राशियों की संख्या बहुत अधिक है, फिर भी, हमें इन सब भौतिक राशियों को व्यक्त करने के लिए, मात्रकों की सीमित संख्या की ही आवश्यकता होती है, क्योंकि ये राशियाँ एक दूसरे से परस्पर संबंधित हैं।

‘‘मूल राशियों को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त मात्रकों को मूल मात्रक कहते हैं। ये मात्रक अन्य मात्रकों पर निर्भर नहीं करते हैं अपितु ये अपने आप में स्वतंत्र होते हैं।’’

व्युत्पन्न मात्रक-

मूल राशियों के अतिरिक्त अन्य सभी भौतिक राशियों के मात्रकों को मूल मात्रकों के संयोजन द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। इस प्रकार प्राप्त किए गए व्युत्पन्न राशियों के मात्रकों को व्युत्पन्न मात्रक कहते हैं। व्युत्पन्न मात्रक मूल मात्रकों पर निर्भर करते हैं।

मात्रकों की प्रणाली (या पद्धति)-

मूल-मात्रकों और व्युत्पन्न मात्रकों के सम्पूर्ण समुच्चय को मात्रकों की प्रणाली (या पद्धति) कहते हैं।

मात्रकों की विभिन्न प्रणालियां-
बहुत वर्षों तक मापन के लिए, विभिन्न देशों के वैज्ञानिक, अलग-अलग मापन प्रणालियों का उपयोग करते थे। अब से कुछ समय-पूर्व तक ऐसी तीन प्रणालियाँ प्रमुखता से प्रयोग में लाई जाती थी-

1. CGS प्रणाली

2. FPS (ब्रिटिश) प्रणाली

3. MKS प्रणाली

इन प्रणालियों में लम्बाई, द्रव्यमान एवं समय के मूल मात्रक क्रमशः इस प्रकार हैं:-

1. CGS प्रणाली - सेन्टीमीटर, ग्राम एवं सेकंड।

2. FPS प्रणाली- फुट, पाउन्ड एवं सेकंड।

3. MKS प्रणाली- मीटर, किलोग्राम एवं सेकंड।

मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली-

आजकल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य प्रणाली अर्थात मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली (एस आई प्रणाली) प्रयुक्त की जाती है। इसको फ्रेंच भाषा में ‘सिस्टम इन्टरनेशनल डि यूनिट्स’ कहते हैं। इसे संकेताक्षर में SI लिखा जाता है। SI प्रतीकों, मात्रकों और उनके संकेताक्षरों की योजना को 1971 में, मापतोल के महासम्मेलन द्वारा विकसित कर, वैज्ञानिक, तकनीकी, औद्योगिक एवं व्यापारिक कार्यों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग हेतु अनुमोदित किया गया था।
SI मात्रकों की 10 की घातों पर आधारित (दाश्मिक या दशमलव) प्रवृति के कारण, इस प्रणाली के अंतर्गत रूपांतरण अत्यंत सुगम एवं सुविधाजनक है।

SI प्रणाली के सात मूल मात्रक-

मूल राशि SI मात्रक का नाम SI मात्रक का प्रतीक

1. लंबाई मीटर m

2. द्रव्यमान किलोग्राम kg

3. समय सेकंड s

4. विद्युत धारा ऐम्पियर A

5. ऊष्मागतिक ताप केल्विन K

6. पदार्थ की मात्रा मोल mol

7. ज्योति-तीव्रता कैण्डेला cd

विमाएं

भौतिक राशियों के व्युत्पन्न मात्रक निकालने के लिए मात्रकों पर जो घातें लगानी पड़ती हैं, उन्हें उस राशि की विमाएँ कहते हैं। यदि किसी राशि की विमाएँ लम्बाई में a द्रव्यमान में b समय में c तथा ताप में d हो तो उस राशि की विमाओं को निम्नलिखित प्रकार से प्रदर्शित किया जाता है—
(La Mb Tc Qd)

प्रमुख भौतिक रशियों के विमीय सूत्र

व्युत्पन्न भौतिक राशि अन्य भौतिक राशियों से सम्बन्ध विमीय सूत्र

क्षेत्रफल = लम्बाई ×चौड़ाई ( L2)
आयतन = लम्बाई ×चौड़ाई × मोटाई (L3)
वेग = विस्थापन / समय ( LT-1)
त्वरण वेग परिवर्तन / समय LT-2
आवेग बल × समय MLT-1
बल द्रव्यमान × त्वरण MLT-2
कार्य बल × विस्थापन ML2T-2
शक्ति कार्य / समय ML2T-3
घनत्व द्रव्यमान / आयतन ML-3
संवेग द्रव्यमान × वेग MLT-1
दाब बल / क्षेत्रफल ML-1T-2
बल आघूर्ण बल × दूरी ML2T-2
प्रतिबल बल / क्षेत्रफल ML-1T-2
विकृति लम्बाई में वृद्धि / प्रारम्भिक वृद्धि L0
पृष्ठ तनाव बल / लम्बाई MT-2
कोणीय वेग कोण / समय T-1
जड़त्व आघूर्ण द्रव्यमान × (दूरी)2 ML2

विस्थापन

एक निश्चित दिशा में दो बिन्दुओं के बीच की लंबवत दूरी को विस्थापित कहते है। यह सदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक मीटर है। विस्थापन धनात्मक, ऋणात्मक और शून्य कुछ भी हो सकता है।

वेग

किसी वस्तु के विस्थापन की दर को या एक निश्चित दिशा में प्रति सेकंड वस्तु द्वारा तय की दूरी को वेग कहते हैं। यह एक सदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक मी/से है।

व्युत्पन्न मात्रक

एक अथवा एक से अधिक मूल मात्रकों पर उपयुक्त घातें लगाकर प्राप्त किए गए मात्रकों को व्युत्पन्न मात्रक कहते हैं, अर्थात् व्युत्पन्न मात्रक मूल मात्रकों पर निर्भर करते हैं। कुछ व्युत्पन्न मात्रक निम्नलिखित हैं—
• क्षेत्रफल = लम्बाई × चौड़ाई
क्षेत्रफल का मात्रक = मीटर × मीटर = मीटर2
• आयतन = लम्बाई × चौड़ाई × ऊँचाई
आयतन का मात्रक = मीटर × मीटर ×मीटर = मीटर3
• घनत्व = द्रव्यमान/आयतन
घनत्व का मात्रक = किग्रा/मीटर3
• वेग = विस्थापन/समय
वेग का मात्रक = मीटर/सेकेण्ड
• चाल = दूरी/समय
चाल का मात्रक = मीटर/सेकेण्ड
• त्वरण = वेग–परिवर्तन/समय
त्वरण का मात्रक = मीटर/सेकेण्ड/सेकेण्ड = मीटर/सेकेण्ड2
• बल = द्रव्यमान ×त्वरण
बल का मात्रक = किग्रा ×मीटर/सेकेण्ड2 = किग्रा–मीटर/सेकेण्ड2 = न्यूटन

संवेग

किसी वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल को उस वस्तु का संवेग कहते हैं. अथार्त् संवेग = वेग x द्रव्यमान
यह एक सदिश राशि है. इसका S.I. मात्रक किग्राम x मी./से. है.

स्थितिज ऊर्जा

स्थितिज ऊर्जा वस्तु के द्रव्यमान, केन्द्र से दूरी और गुरुत्वाकर्षण बल पर निर्भर करती है। इसका अंतर्राष्ट्रीय इकाई मात्रक जुल है।