Showing posts with label राजनीति विज्ञान. Show all posts
Showing posts with label राजनीति विज्ञान. Show all posts

Wednesday, 12 June 2019

राजनीति विज्ञान Political Science in Hindi Part-7




राजनीति विज्ञान Political Science in Hindi Part-7





राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व


  • 36. परिभाषा-
  • इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, 'राज्य' का वही अर्थ है जो भाग 3 में है।
  • 37. इस भाग में अंतर्विष्ट तत्त्वों का लागू होना-
  • इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे किंतु फिर भी इनमें अधिकथित तत्त्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्त्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।
  • 38. राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा-
  • राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, भरसक प्रभावी रूंप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा।
  • राज्य, विशिष्टतया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यष्टियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा।
  • 39. राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्त्व-
  • राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूंप से-
  • (क) पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूंप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो;
  • (ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूंप से साधन हो;
  • (ग) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संक्रेंद्रण न हो;
  • (घ) पुरुषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन हो;
  • (ङ) पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुंपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोज़गारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हों;
  • (च) बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।
  • 39क. समान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता-
राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह, विशि−टतया, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति से नि:शुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।
  • 40. ग्राम पंचायतों का संगठन-
राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए क़दम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूंप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों।
  • 41. कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार-
राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने के, शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और नि:शक्तता तथा अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।
  • 42. काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध-
राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा।
  • 43. कर्मकारों के लिए निर्वाह मज़दूरी आदि-
राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रति से कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मज़दूरी, शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सहकारी आधार पर बढ़ाने का प्रयास करेगा।
  • 43(क). उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना-
राज्य किसी उद्योग में लगे हुए उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीति से क़दम उठाएगा।
  • 44. नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता-
राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।
  • 45. बालकों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध-
राज्य, इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक, नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा।
  • 46. अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि-
राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उसकी संरक्षा करेगा।
  • 47. पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्तव्य-
  • राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया, मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।
  • 48. कृषि और पशुपालन का संगठन :-
  • राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारूं और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए क़दम उठाएगा।
  • 48क. पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा :-
राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।
  • 49. राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण :-
  • [संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन राष्ट्रीय महत्व वाले [घोषित किए गए] कलात्मक या ऐतिहासिक अभिरुंचि वाले प्रत्येक संस्मारक या स्थान या वस्तु का, यथास्थिति, लुंठन, विरूंपण, विनाश, अपसारण, व्ययन
या निर्यात से संरक्षण करना राज्य की बाध्यता होगी।
  • 50. कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण :-
  • राज्य की लोक सेवाओं में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने के लिए राज्य क़दम उठाएगा।
  • 51. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि राज्य,--
राज्य,-
  • (क) अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का,
  • (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का,
  • (ग) संगठित लोगों के एक दूसरे से व्यवहारों में अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और
  • (घ) अंतरराष्ट्रीय विवादों के माध्यस्थम द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का, प्रया





संघीय कार्यपालिका एवं भारत का राष्ट्रपति

भारतीय संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है.
1. भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है. इसलिए राष्ट्रपति नामपत्र की कार्यपालिका है तथा प्रधानमंत्री तथा उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है.
राष्ट्रपति
a.
 राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक प्रधान होता है.
b. 
भारत का राष्ट्रपति भारत का प्रथम व्यक्ति कहलाता है.

2. राष्ट्रपति पद की योग्यता: संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार कोई व्यक्ति राष्‍ट्रपति होने योग्य तब होगा, जब वह:
(a) 
भारत का नागरिक हो.

(b) 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो.
(c) लोकसभा का सदस्य निर्वाचित किए जाने योग्य हो.
(d)
 चुनाव के समय लाभ का पद धारण नहीं करता हो.

नोट: यदि व्यक्ति राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद पर हो या संघ अथवा किसी राज्य की मंत्रिपरिषद का सदस्य हो, तो वह लाभ का पद नहीं माना जाएगा.
3. राष्‍ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक मंडल: इसमें राज्य सभा, लोकसभा और राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य रहते हैं. नवीनतम व्यवस्था के अनुसार पांडिचेरी विधानसभा तथा दिल्ली की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य को भी सम्मिलित किया गया है.
4. राष्ट्रपति-पद के उम्मीदवार के लिए निर्वाचक-मंडल के 50 सदस्य प्रस्तावक तथा 50 सदस्य अनुमोदक होते हैं.
5. एक ही व्यक्ति जितनी बार भी चाहे राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो सकता है.
6. राष्ट्रपति का निर्वाचन समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और एकल संक्रमणीय मत पद्धति के द्वारा होता है.
7. राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवादों का निपटारा उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है. निर्वाचन अवैध घोषित होने पर उसके द्वारा किए गए कार्य अवैध नहीं होते हैं.
8. राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तिथि से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा. अपने पद की समाप्ति के बाद भी वह पद पर तब तक बना रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता है.
9. पद-धारण करने से पूर्व राष्ट्रपति को एक निर्धारित प्रपत्र पर भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा उनकी गैरमौजूदगी में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश के सम्मुख शपथ लेनी पड़ती है.
10. राष्ट्रपति निम्न दशाओं में पांच वर्ष से पहले भी पद त्याग सकता है:
(a)
 उपराष्ट्रपति को संबोधित अपने त्यागपत्र द्वारा.
(b)
 महाभियोग द्वारा हटाए जाने पर (अनुच्छेद 56 एवं 61) महाभियोग के लिए केवल एक ही आधार है, जो अनुच्छेद 61(1) में उल्लेखित है, वह है संविधान का अतिक्रमण.

11. राष्ट्रपति पर महाभियोग: राष्ट्रपति द्वारा संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन पर संसद किसी सदन द्वारा उस पर महाभियोग लगाया जा सकता है, परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि राष्ट्रपति को 14 दिन पहले ही लिखित सूचना दी जाए, जिस पर उस सदन के एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर हों. संसद के उस सदन, जिसमें महाभियोग का प्रस्ताव पेश है, के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा पारित कर देने पर प्रस्ताव दूसरे सदन में जाएगा, तब दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए गए आरोपों की जांच करेगा या कराएगा और ऐसी जांच में राष्ट्रपति पर लगाए गए आरोपों को सिद्ध करने वाला प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है, तब राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया पूरी समझी जाएगी और उसी तिथि से राष्ट्रपति को पदत्याग करना होगा. 

12.
 राष्ट्रपति की रिक्ति को 6 महीने के अंदर भरना होता है.


13
. जब राष्ट्रपति पद की रिक्ति पदावधि (पांच वर्ष) की समाप्ति से हुई है, तो निर्वाचन पदावधि की समाप्ति के पहले ही कर लिया जाएगा. [अनुच्छेद 61(1)] किन्तु यदि उसे पूरा करने में कोई विलंब हो जाता है तो 'राज-अंतराल' न होने पाए इसिलिए यह उपबंध है कि राष्ट्रपति अपने पद की अवधि समाप्त हों जाने पर भी तब तक पद पर बना रहेगा, जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण नहीं कर लेता है, [अनुच्छेद 56(1) ग] (ऐसी दशा में उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य नहीं कर सकेगा. 

(a) राष्ट्रपति के वेतन एवं भत्ते: राष्ट्रपति का मासिक वेतन डेढ़ लाख रुपया है.
(b) राष्ट्रपति का वेतन आयकर से मुक्त होता है. 
(c) राष्ट्रपति को नि: शुल्क निवासस्थान व संसद द्वारा स्वीकृति अन्य भत्ते प्राप्त होतें हैं. 
(d) राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान उनके वेतन तथा भत्ते में किसी प्रकार की कमी नहीं की जा सकती है. 
(e) राष्ट्रपति के लिए 9 लाख रुपये वार्षिक पेंशन निर्धारित की गई है. 

राष्ट्रपति के अधिकार एवं कर्तव्य 
[1] नियुक्ति संबंधी अधिकार: राष्ट्रपति निम्न की नियुक्ति करता है:
(a) भारत का प्रधानमंत्री, 
(b) प्रधानमंत्री की सलाह पर मंत्रिपद के अन्य सदस्यों, 
(c) सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों, 
(d) भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, 
(e) राज्यों के राज्यपाल, 
(f) मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त, 
(g) भारत के महान्यायवादी, 
(h) राज्यों के मध्य समन्वय के लिए अंतर्राज्यीय परिषद के सदस्य, 
(i) संघीय लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों, 
(j) संघीय क्षेत्रों के मुख्य आयुक्तों, 
(k) वित्त आयोग के सदस्यों, 
(l) भाषा आयोग के सदस्यों, 
(m) पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्यों, 
(n) अल्पसंख्यक आयोग के सदस्यों, 
(o) भारत के राजदूतों तथा अन्य राजनयिकों, 
(p) अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में रिपोर्ट देने वाले आयोग के सदस्यों आदि. 

[2] विधाई शक्तियां: 
राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होता है. इसे निम्न विधायी शक्तियां प्राप्त हैं: 
(1) संसद के सत्र को आहूत करने, सत्रावसान सभा भंग करने संबंधी अधिकार. 
(2) संसद के एक सदन में या एक साथ सम्मिलित रूप से दोनों सदनों में अभिभाषण करने की शक्ति. 
(3) लोकसभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात प्रथम सत्र के प्रारंभ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरम्भ में सम्मिलित रूप से संसद में अभिभाषण करने की शक्ति.  
(4) संसद दवरा पारित विधेयक राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद ही कानून बनता है.
(5) संसद में निम्न विधेयक को पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति आवश्यक है: 
(a) नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्य के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन संबंधी विधेयक 
(b) धन विधेयक [अनुच्छेद 117(1)] 
(c) संचित निधि में व्यय करने वाले विधेयक [अनुच्छेद 117(3)]
(d) ऐसे कराधान पर, जिसमें राज्य हित जुड़े हैं, प्रभाव डालने वाले विधेयक. 
(e) राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य और समागम पर निर्बन्धन लगाने वाले विधेयक.
[3] संसद सदस्यों के मनोनयन का अधिकार: 
जब राष्ट्रपति को यह लगे की लोकसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय के व्यक्तियों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं हैं, तब तक वह उस समुदाय के दो व्यक्तियों को लोकसभा के सदस्य के रूप में नामांकित कर सकता है. इसी प्रकार वह कला, साहित्य, पत्रकारिता, विज्ञान तथा सामाजिक कार्यों में पर्याप्त अनुभव एवं दक्षता रखने वाले 12 व्यक्तियों को राज्य सभा में नामजद कर सकता है.
[4] अध्यादेश जारी करने की शक्ति:
संसद के स्थगन के समय अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर सकता है, जिसका प्रभाव संसद के अधिनियम के समान होता है. इसका प्रभाव संसद सत्र शुरू होने के सप्ताह तक रहता है. परन्तु, राष्ट्रपति राज्य सूची के विषयों पर अध्यादेश नहीं जारी कर सकता, जब दोनों सदन सत्र में होते हैं, तब राष्ट्रपति को यह शक्ति नहीं होती है.
[5] सैनिक शक्ति: सैन्य बालों की सर्वोच्च शक्ति राष्ट्रपति में सन्निहित है, किन्तु इसका प्रयोग विधि द्वारा नियमित होता है.
[6]राजनैतिक शक्ति: दूसरे देशों के साथ कोई भी समझौता या संधि राष्ट्रपति के नाम से की जाती है. राष्ट्रपति विदेशों के लिए भारतीय राजदूतों की नियुक्ति करता है एवं भारत में विदेशों के राजदूतों की नियुक्ति का अनुमोदन करता है.
[7] क्षमादान की शक्ति: संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलम्बन, परिहार और लघुकरण की शक्ति प्राप्त है.
[8] राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां: आपातकाल से संबंधित उपबंध भारतीय संविधान के भाग-18 के अनुच्छेद 352 से 360 के अंतर्गत मिलता है. मंत्रिपरिषद के परामर्श से राष्ट्रपति तीन प्रकार के आपात लागू कर सकता है: 
(a) युद्ध या वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण लगाया गया आपात (अनुच्छेद 352)
(b) राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल होने से उत्पन्न आपात (अनुच्छेद 356) (अर्थात राष्ट्रपति शासन) 
(c) वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360) (न्यूनतम अवधि दो महीने).
[9] राष्ट्रपति किसी सार्वजनिक महत्‍व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से अनुच्छेद 143 के अधीन परामर्श ले सकता है, लेकिन वह यह परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं है. 
[10] राष्ट्रपति की किसी विधेयक पर अनुमति देने या न देने के निर्णय लेने की सीमा का आभाव होने के कारण राष्ट्रपति जेबी वीटो का प्रयोग कर सकता है, क्यूंकि अनुच्छेद 111 केवल यह कहता है कि यदि राष्ट्रपति विधेयक लौटाना चाहता है, तो विधेयक को उसे प्रस्तुत किए जाने के बाद यथशीघ्र लौटा देगा. जेबी वीटो शक्ति का प्रयोग का उदहारण है, 1986 ई० में संसद द्वारा पारित भारतीय डाकघर संशोधन विधेयक, जिस पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने कोई निर्णय नहीं लिया.
राष्‍ट्रपति चुनाव से जुड़े कुछ तथ्‍य:
1.
 डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे वे लगातार दो बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. 

2. डॉ. एस राधाकृष्णन लगातार दो बार उपराष्ट्रपति तथा एक बार राष्ट्रपति रहे. 
3. केवल वी. वी. गिरि के निर्वाचन के समय दूसरे चक्र की मतगणना करनी पड़ी. 
4. केवल नीलम संजीव रेड्डी ऐसे राष्ट्रपति हुए जो एक बार चुनाव में हार गए, फिर बाद में निर्विरोध राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. 
5. भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल है.
उपराष्ट्रपति 63वें अनुच्छेद 
1. संविधान के अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा. (कार्यकाल 5 वर्ष) 
2. संविधान में उपराष्ट्रपति से संबंधित प्रावधान अमेरिका के संविधान से ग्रहण किया गया है. 
3. भारत का उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होता है. 
4. उपराष्ट्रपति राज्य सभा का सदस्य नहीं होता है, अत: मतदान का अधिकार नहीं है किन्तु सभापति के रूप में निर्णायक मत देने का अधिकार उसे प्राप्त है. 
5. योग्यता: कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने के योग्य तभी होगा, जब वह: 
(a) भारत का नागरिक हो, 
(b) 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, 
(c) राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के योग्य हो, 
(d) निर्वाचन के समय किसी प्रकार के लाभ के पद पर नहीं हो, 
(e) वह संसद के किसी सदन या राज्य के विधान मंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं हो सकता और यदि ऐसा व्यक्ति उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने उस सदन का अपना स्थान अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है.
6.
 उपराष्ट्रपति को अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी पड़ती है. 

7. राष्ट्रपति के पद खाली रहने पर उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की हैसियत से कार्य करता है. उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने की अधिकतम अवधि 6 महीने होती है. इस दौरान राष्ट्रपति का चुनाव करा लेना अनिवार्य होता है. राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति को मिलने वाली वेतन तथा सभी सुविधाओं का उपभोग करता

प्रधानमंत्री एवं परिषद
1.
 संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति को उसके कार्यों के संपादन व सलाह देने हेतु एक मंत्रीपरिषद होती है, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है.

2. संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा. 
3. मंत्रिपरिषद का सदस्य बनने के लिए वैधानिक दृष्टि से यह आवश्यक है कि व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य हो, यदि व्यक्ति मंत्री बनते समय संसद-सदस्य नहीं हो, तो उसे 6 महीने के अंदर संसद सदस्य बनना अनिवार्य है नहीं तो उसे अपना पद छोड़ना होगा. 
4. पद ग्रहण से पूर्व प्रधानमंत्री सहित प्रत्येक मंत्री को राष्ट्रपति के सामने पद और गोपनीयता की शपथ लेनी होती है. 
5. सभी मंत्रियों, राज्य मंत्रियों और उपमन्त्रियों को नि:शुल्क निवास स्थान तथा अन्य सुविधाएं प्राप्त होती हैं. 
6. मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होती है. 
7. यदि लोक सभा किसी एक मंत्री के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित करे अथवा उस विभाग से सम्बंधित विधेयक को रद्द कर दे, तो समस्त मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना होता है. 
8. मंत्री तीन प्रकार के होते है- कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री एवं उपमंत्री. कैबिनेट मंत्री विभाग के अध्यक्ष होते हैं. प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट मंत्री को मिलाकर मंत्रिमंडल का निर्माण होता है.
9. प्रधानमंत्री की सलाह पर ही राष्ट्रपति लोक सभा भंग करता है. 
10. प्रधानमंत्री योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष होता है. 
11. प्रधानमंत्रियों में सबसे बड़ा कार्यकाल प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का रहा. वे कुल 16 साल 9 महीने और 13 दिन तक अपने पद पर रहे. 
12. देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बनी. वे ऐसी पहली व्यक्ति रही जो दो अलग-अलग अवधियों में प्रधानमंत्री रहीं. 
13. पहली बार जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो वह राज्य सभा की सदस्य थीं. 
14. चरण सिंह एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जो कभी लोकसभा में उपस्थित नहीं हुए. 
15. विश्वास मत प्राप्त करने में असफल होने वाले पहले प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह हुए. 
16. सबसे कम समय तक एक कार्यकाल में प्रधानमंत्री के पद पर रहने वाले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हुए (मात्र 13 दिन). 
17. कैबिनेट मंत्रियों में सबसे बड़ा कार्यकाल जगजीवन राम का रहा, जो लगभग 32 वर्ष तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहे.

राजनीति विज्ञान Political Science in Hindi Part-6

राजनीति विज्ञान Political Science in Hindi Part-6






रियासतों का एकीकरण और विलय

          द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ होने के पश्चात भारत में तीव्र राजनैतिक गतिविधियां प्रारंभ होने तथा कांग्रेस द्वारा असहयोग की नीति अपनाये जाने के कारण ब्रिटिश सरकार ने क्रिप्स मिशन (1942), वैवेल योजना (1945), कैबिनेट मिशन (1946) तदुपरांत एटली की घोषणा (1947) द्वारा गतिरोध को हल करने का प्रयत्न किया।
            राष्ट्रीय अस्थायी सरकार में रियासत विभाग के मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल, जिन्हें मंत्रालय के सचिव के रूप में वी.पी. मेनन की सेवायें प्राप्त थीं, भारतीय रियासतों से देशभक्तिपूर्ण अपील की कि वे अपनी रक्षा, विदेशी मामले तथा संचार अवस्था को भारत के अधीनस्थ बना कर भारत में सम्मिलित हो जायें।
          15 अगस्त 1947 के अंत तक 136 क्षेत्राधिकार रियासतें भारत में सम्मिलित हो चुकी थीं। किंतु कुछ अन्य ने स्वयं को इस व्यवस्था से अलग रखा

जूनागढ़
              यहां का मुस्लिम नवाब रियासत को पाकिस्तान में सम्मिलित करना चाहता था किंतु हिंदू जनसंख्या भारत में सम्मिलित होने के पक्ष में थी। जनता ने भारी बहुमत से भारत में सम्मिलित होने के पक्ष में निर्णय दिया।

हैदराबाद
                  हैदराबाद का निजाम अपनी संप्रभुता को बनाये रखने के पक्ष में था। यद्यपि यहां की बहुसंख्या जनता भारत में विलय के पक्ष में थी। उसने हैदराबाद को भारत में सम्मिलित करने के पक्ष में तीव्र आदोलन प्रारंभ कर दिया। निजाम आंदोलनकारियों के प्रति दमन की नीति पर उतर आया। 29 नवंबर 1947 को निजाम ने भारत सरकार के साथ एक समझौते पर दस्तखत तो कर दिये किंतु इसके बावजूद उसकी दमनकारी नीतियां और तेज हो गयीं। सितंबर 1948 तक यह स्पष्ट हो गया कि निजाम को समझा-बुझा कर राजी नहीं किया जा सकता।। 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेनाएं हैदराबाद में प्रवेश कर गयीं और 18 सितम्बर 1948 को निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया। अंततः नवंबर 1949 में हैदराबाद को भारत में सम्मिलित कर लिया गया।

कश्मीर
           जम्मू एवं कश्मीर राज्य का शासक हिन्दू एवं जनसंख्या मुस्लिम बहुसंख्यक थी। यहां का शासक भी कश्मीर की संप्रभुता को बनाये रखने के पक्ष में था तथा भारत या पाकिस्तान किसी भी डोमिनियन में नहीं सम्मिलित होना चाहता था। किंतु कुछ समय पश्चात ही नवस्थापित पाकिस्तान ने कबाइलियों को भेजकर कश्मीर पर आक्रमण कर दिया । अंत में विवश होकर कश्मीर के शासक ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिये। तत्पश्चात कबाइलियों  को खदेड़ने के लिये भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर भेजी गयी।
         भारत ने पाकिस्तान समर्थित आक्रमण की शिकायत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दर्ज करायी तथा उसने जनमत संग्रह द्वारा समस्या के समाधान की सिफारिश की। इसके साथ ही भारत ने 84 हजार वर्ग किलोमीटर का भू-क्षेत्र पाकिस्तान के अधिकार में ही छोड़ दिया। भारतीय संविधान के निर्माण के पश्चात जम्मू एवं कश्मीर राज्य को अनुच्छेद 370 के द्वारा विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।




भारतीय नागरिकता

नागरिकता की व्यवस्थाभारतीय संविधान के 5 से 11 तक के अनुच्छेदों में नागरिकता सम्बन्धी व्यवस्था की गयी है। संविधान अग्रांकित श्रेणी के व्यक्तियों को नागरिकता प्रदान करता है:
(1) जन्मजात नागरिक:-संविधान लागू होने के समय (26 जनवरी, 1950 ई.) निम्न तीन श्रेणियों के व्यक्ति भारत के जन्मजात नागरिक माने गये:
प्रथम श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जो भारत भूमि में पैदा हुए हों,
दूसरी श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जिनके माता-पिता या इन दोनों में से कोई एक भारत की भूमि में पैदा हुए हों, तथा
तृतीय श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जो भारतीय संविधान के घोषित होने के पूर्व कम-से-कम 5 वर्ष से भारत भूमि पर निवास कर रहे हों।
(2) शरणार्थी नागरिक:-संविधान में उन व्यक्तियों की नागरिकता का भी विवेचन किया गया है जो पाकिस्तान से भारत आये हैं। संविधान के अनुसार वे व्यक्ति जो 19 जुलाई, 1948 के पूर्व पाकिस्तान से भारत आये हैं, भारत के नागरिक समझे जायेंगे। जो व्यक्ति 19 जुलाई, 1948 के बाद पाकिस्तान से भारत आये और जिन्होंने भारत में कम-से-कम 6 मास रहने के बाद उचित अधिकारी के समक्ष नागरिक बनने के लिए प्रार्थना-पत्र देकर संविधान लागू होने के पूर्व अपना नाम रजिस्टर्ड करा लिया, उन्हें भी नागरिकता का अधिकार प्रदान कर दिया गया।
1 मार्च, 1947 के बाद जो व्यक्ति भारत से पाकिस्तान चले गये हैं, सामान्यतया उन्हें भारतीय नागरिकता से वंचित कर दिया गया है, लेकिन इनमें से भी उन लोगों को, जो भारत में स्थायी निवास का परमिट लेकर पाकिस्तान से भारत में चले आये हैं, 6 महीने भारत में रहने के बाद प्रार्थना-पत्र देकर रजिस्टेशन करवा लेने पर भारत की नागरिकता मिल सकती है।
(3) विदेशों में रहने वाले भारतीय:-विदेशों में जो भारतीय रहते हैं, यदि वे निम्न दो शर्तें पूरी करते हों तो भारतीय नागरिक बन सकते हैं: ;उनका या उनके माता-पिता या उनके दादा-दादी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ हो, उन्होंने विदेश में स्थित भारतीय राजदूत के पास भारत का नागरिक बनने के लिए आवेदन-पत्र देकर अपना नाम रजिस्टर में लिखा लिया हो।

संविधान लागू होने के बाद नागरिकता की व्यवस्था
भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955
हमारे संविधान ने संसद को यह अधिकार दिया है कि वह भारतीय नागरिकता से सम्बन्धित सभी विषयों के सम्बन्ध में व्यवस्था करे। अतः संसद ने 1955 ई0 में ’भारतीय नागरिकता अधिनियम’ पारित किया। इस अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि भारतीय नागरिकता की प्राप्ति किस प्रकार होगी तथा किन परिस्थितियों में भारतीय नागरिकता का अन्त हो जाएगा।
नागरिकता की प्राप्ति:-उपर्युक्त अधिनियम के अनुसार निम्न में से किसी एक आधार पर नागरिकता प्राप्त की जा सकती है:
(1) जन्म से-प्रत्येक व्यक्ति जिसका जन्म संविधान लागू होने अर्थात् 26 जनवरी, 1950 को या उसके पश्चात् भारत में हुआ हो वह जन्म से भारत का नागरिक होगा। (कुछ अपवादों जैसे राजनयिकों तथा शत्रु विदेशियों के बच्चे भारत के नागरिक नहीं माने जायेंगे)।
(2) रक्त सम्बन्ध या वंशाधिकार से-26 जनवरी, 1950 को या उसके पश्चात् भारत के बाहर जन्मा कोई भी व्यक्ति, कतिपय अपेक्षाओं के अधीन रहते हुए भारत का नागरिक होगा, यदि उसके जन्म के समय उसकी माता या पिता भारत का नागरिक था।
(3) पंजीकरण द्वारा-निम्न श्रेणी के व्यक्ति पंजीकरण के आधार पर भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं: ऐसे व्यक्ति जो 26 जुलाई, 1947 के बाद पाकिस्तान से आए हैं, उस दशा में भारतीय नागरिक माने जायेंगे जब वे आवेदन-पत्र देकर अपना नाम ’भारतीय नियुक्ति अधिकारी’ के पास नागरिकता के रजिस्टर में दर्ज करा लें। परन्तु ऐसे लोगों के लिए शर्त यह होगी कि आवेदन-पत्र देने से पूर्व कम-से-कम 6 माह से भारत में रहते हों तथा उनका या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ हो।
  1. ऐसे भारतीय जो विदेशों में जाकर बस गए हैं, भारतीय दूतावासों में आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  2. विदेशी स्त्रियां, जिन्होंने भारतीय नागरिकों से विवाह कर लिया हो, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगी।
  3. भारतीय नागरिकों के नाबालिग बच्चे।
  4. राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिक, यदि वे भारत में ही रहते हों या भारत सरकार की नौकरी कर रहे हों। आवेदन पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।
(4) देशीकरण द्वारा-विदेशी नागरिक भी निम्न शर्तों को पूरा करने पर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं:
  1. वह किसी ऐसे देश का नागरिक न हो जहां भारतीय देशीयकरण द्वारा नागरिक बनने से रोक दिए जाते हों।
  2. वह अपने देश की नागरिकता का परित्याग कर चुका हो और केन्द्रीय सरकार को इस बात की सूचना दे दी हो।
  3. वह आवेदन देने के पूर्व कम-से-कम एक वर्ष से लगातार भारत में रह रहा हो
  4. वह उपरोक्त एक वर्ष से पहले कम-से-कम 5 वर्षों तक भारत में रह चुका हो या भारत सरकार की नौकरी में रह चुका हो अथवा दोनों मिलाकर 7 वर्ष हो पर किसी हालत में 4 वर्ष से कम समय न हो।
  5. उसका आचरण अच्छा हो।
  6. वह भारत की किसी प्रादेशिक भाषा या राजभाषा का अच्छा जानकार हो।
संविधान में ऐसे व्यक्ति को विशेष छूट दी गई है जो दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य विश्वशान्ति या मानव विकास के क्षेत्र में विशेष कार्य कर चुका हो। उपरोक्त श्रेणी के व्यक्तियों को संविधान में निर्दिष्ट शर्तों को पूरा किए बिना भी नागरिकता प्रदान की जा सकती है।
(5) भूमि विस्तार द्वारा-यदि किसी नवीन क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाए तो वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। जैसे 1961 ई0 में गोवा को भारत में शामिल किए जाने पर वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो गई।

नागरिकता का अन्त
भारत नागरिकता का अन्त निम्न प्रकार से हो सकता है:
(1) नागरिकता परित्याग करने से:-यदि कोई वयस्क व्यक्ति भारतीय नागरिकता के परित्याग की घोषणा करता है तो वह घोषणा विशेष अधिकारी द्वारा पंजीकृत कर ली जायेगी और वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं रहेगा। इसके साथ ही उस व्यक्ति के नाबालिग बच्चों की भारतीय नागरिकता भी समाप्त हो जायेगी।
(2) स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार कर लेने से :- यदि भारत का कोई नागरिक पंजीकरण देशीयकरण या अन्य किसी प्रकार से किसी दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो ऐसी स्थिति में वह भारत का नागरिक नहीं रहेगा।
(3) संघ सरकार द्वारा नागरिकता का अपहरण:- भारत की संघ सरकार निम्नलिखित कारणों के आधार पर नागरिकता का अपहरण कर सकती है:
  1. असत्य अभिलेख:-यदि किसी व्यक्ति ने धोखा देकर या गलत बयान देकर या आवश्यक बातों को छिपाकर नागरिकता प्राप्त कर ली है तो सही जानकारी प्राप्त होने पर उसकी नागरिकता समाप्त की जा सकती है।
  2. देशद्रोह से:-यदि किसी व्यक्ति ने भारत के प्रति देशद्रोह किया है, या युद्ध के समय शत्रु की सहायता की है।
  3. दीर्घ प्रवास से:-यदि कोई व्यक्ति भारत सरकार की अनुमति के बिना लगातार सात वर्ष तक विदेश में रहे और विदेश के भारतीय दूतावास में अपनी भारतीय नागरिकता बनाये रखने की इच्छा से प्रतिवर्ष पंजीकरण भी न कराये तो उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त की जा सकती है।
  4. अपराध से:- यदि किसी व्यक्ति ने पंजीकरण या देशीयकरण से नागरिकता प्राप्त की है और नागरिकता प्राप्त करने के पांच वर्ष के भीतर किसी देश में उसे कम-से-कम दो वर्ष की सजा हुई है, तो उसकी नागरिकता समाप्त की जा सकती है।
संघ सरकार किसी व्यक्ति की नागरिकता का अन्त करे, इसके पहले उसे अपनी सफाई देने का पूरा अवसर दिया जायेगा।

राष्ट्रमण्डलीय नागरिकता:-नागरिकता अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता यह है कि राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों के नागरिकों को भारत की राष्ट्रमण्डलीय नागरिकता प्राप्त होगी। केन्द्रीय सरकार पारस्परिक के आधार पर राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिकों को भारतीय नागरिकता के कुछ अधिकार प्रदान कर सकती है।

नागरिकों को प्राप्त विशेषाधिकार(नागरिकता का महत्व)
निम्नलिखित मूल अधिकार और अधिकार संविधान में केवल नागरिकों को ही प्रदान किए गए हैं:
(1) राज्य नागरिकों के बीच केवल मूल वंश जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा-अनुच्छेद 15
(2) राज्य द्वारा प्रदत्त नौकरियों के विषय में अवसर की समानता का अधिकार-अनुच्छेद 16
(3) अनुच्छेद 19 में उल्लिखित मूल स्वतन्त्रताएं, जैसे भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, सभा, संघ, आवास, सम्पत्ति तथा पेशे की स्वतन्त्रता।
(4) अनुच्छेद 29 एवं 30 द्वारा प्रदत्त सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार।
(5) राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीश, राज्यपाल, महान्यायवादी, महाधिवक्ता, आदि पद केवल नागरिकों द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं।
(6) केन्द्रीय विधानमण्डल और राज्य विधानमण्डलों के प्रतिनिधियों के चुनने का मताधिकार और इन संस्थाओं के सदस्य बनने के अधिकार केवल नागरिकों को ही प्रदान किए गए हैं।
(7) भारत में इन अधिकारों के साथ नागरिकों के कर्तव्य भी निर्धारित किए गए हैं।





भारतीय संघ एवं राज्यों का पुनर्गठन

भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन उचित है या नहीं इसकी जांच के लिए संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश के एस के धर की अध्यक्षता में एक चार सदस्य आयोग की नियुक्ति की इस आयोग ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विरोध किया और प्रशासन की सुविधा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया धर आयोग के निर्णयों की परीक्षा करने के लिए कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने जयपुर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू सरदार वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया की एक समिति का गठन किया इस समिति ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग को खारिज कर दिया।
58 दिन केआमरण अनशन के बाद 15 दिसंबर 1952 ई.को रामल्लू की मृत्यु हो गई ,रामल्लू मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री नेहरु ने तेलुगु भषियोंके लिए पृथक आंध्र प्रदेश के गठन की घोषणा कर दी। 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र प्रदेश राज्य का गठन हो गया। यह राज्य भाषा के आधार पर अलग होने वाला पहला राज्य था। उस समय आंध्र प्रदेश की राजधानी करनूल थी।
राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष फजल अली थे राज्य पुनर्गठन अधिनियम जुलाई 1956 ई. में पास किया गया इसके अनुसार भारत में 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया वर्तमान समय में भारत में 29 राज्य एवं 7 संघ राज्य क्षेत्र हैं इन्हें ही संविधान की प्रथम अनुसूची में शामिल किया गया है।

  • नए राज्यों का गठन वर्ष
  • आंध्र प्रदेश 1 अक्टूबर 1953
  • महाराष्ट्र 1 मई 1960
  • गुजरात 1 मई 1960
  • नागालैंड 1 दिसंबर 1963
  • हिमाचल प्रदेश 25 जनवरी 1971
  • मेघालय 21 जनवरी 1972
  • मणिपुर 21 जनवरी 1972
  • त्रिपुरा 21 जनवरी 1972
  • सिक्किम 26 अप्रैल 1975
  • मिजोरम 20 फरवरी 1987
  • अरुणाचल प्रदेश 20 फरवरी 1987
  • छत्तीसगढ़ 1 नवंबर 2000
  • उत्तराखंड 9 नवंबर 2000
  • झारखंड 15 नवंबर 2000
  • तेलंगाना 2 जून 2014



मौलिक अधिकार

भाग -3 मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक) (अमेरिका से लिये)

मौलिक अधिकारों से तात्पर्य वे अधिकार जो व्यक्तियों के सर्वागिण विकास के लिए आवश्यक होते है इन्हें राज्य या समाज द्वारा प्रदान किया जाता है।तथा इनके संरक्षण कि व्यवस्था की जाती है।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को वैश्विक मानवाधिकारो की घोषणा की गई इसलिए प्रत्येक 10 दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है।
भारतीय संविधान में 7 मौलिक अधिकारों का वर्णन दिया गया था।
समानता का अधिकारा - अनुच्छेद 14 से 18 तक
स्वतंन्त्रता का अधिकार - अनुच्छेद 19 से 22 तक
शोषण के विरूद्ध अधिकार - अनुच्छेद 23 व 24
धार्मिक स्वतंन्त्रता का अधिकार - अनुच्छेद 25 से 28 तक
शिक्षा एवम् संस्कृति का अधिकार - अनुच्छेद 29 और 30
सम्पति का अधिकार - अनुच्छेद 31
सवैधानिक उपचारो का अधिकार - अनुच्छेद 32
अनुच्छेद - 12 राज्य की परिभाषा
अनुच्छेद - 13 राज्य मौलिक अधिकारों का न्युन(अतिक्रमण) करने विधियों को नहीं बनाऐंगा।
44 वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा "सम्पति के मौलिक अधिकार" को इस श्रेणी से हटाकर "सामान्य विधिक अधिकार" बनाकर 'अनुच्छेद 300(क)' में जोड़ा गया है।

वर्तमान में मौलिक अधिकारों की संख्या 6 है।

समानता का अधिकार- अनच्छेद 14 से अनुच्छेद 18

अनुच्छेद - 14 विधी कके समक्ष समानता ब्रिटेन से तथा विधि का समान सरंक्षण अमेरिका से लिया
अनुच्छेद - 15 राज्य जाती धर्म लिंग वर्ण, आयु और निवास स्थान के समक्ष भेदभाव नहीं करेगा।
राज्य सर्वाजनिक स्थलों पर प्रवेश से पाबन्दियां नहीं लगायेगा।
अनुच्छेद 15(3) के अन्तर्गत राज्य महीलाओं और बालकों को विशेष सुविधा उपलब्ध करवा सकता है।
अनुच्छेद - 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता(सरकारी नौकरीयों में आरक्षण का प्रावधान)
अनुच्छेद 16(1) राज्य जाती, धर्म, लिंग वर्ण और आयु और निवास स्थान के आधार पर नौकरी प्रदान करने में भेदभाव नहीं करेगा लेकिन राज्य किसी प्रान्त के निवासियो को छोटी नौकरीयों में कानुन बनाकर संरक्षण प्रदान कर सकता है।
अनुच्छेद 16(4) के अन्तर्गत राज्य पिछडे वर्ग के नागरिको को विशेष संरक्षण प्रदान कर सकता है।
इसमें भुमिपुत्र का सिद्धान्त दिया गया है।
अनुच्छेद - 17 अस्पृश्यता/छुआ छुत का अन्त - भारतीय संसद ने अस्पृश्यता निशेध अधिनियम 1955 बनाकर इसे दण्डनिय अपराध घाषित किया है।
अनुच्छेद - 18 उपाधियों का अन्त किया गया है राज्य सैन्य और शैक्षिक क्षेत्र के अलावा उपाधि प्रदान नहीं करेगा(वर्तमान में समाज सेवा केा जोड़ा गया) ।उपाधि ग्रहण करने से पुर्व देश के नागरिक तथा विदेशी व्यक्तियों को राष्ट्रपति की अनुमति लेना आवश्यक है।

स्वतन्त्रता का अधिकर- अनुच्छेद 19 से 22 तक

अनुच्छेद - 19 में सात प्रकार की स्वतंन्त्रता दी गई थी 44 वें संविधान संशोधन 1978(सम्पति अर्जित की स्वतन्त्रता हटा दिया)
अनुच्छेद 19(1)(क) - भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता
- प्रैस और मिडिया की स्वतंन्त्रता
- सुचना प्राप्त करने का अधिकार - 12 अक्टूबर 2005 से जोड़ा।
अनुच्छेद 19(1)(ख) - शान्ति पूर्वक बिना अस्त्र-शस्त्र के सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता।
अपवाद - सिखों को कटार धारण करने का अधिकार।
अनुच्छेद 19(1)(ग) - संघ या संगम बनाने की स्वतंन्त्रता।
अपवाद - सैन्य संगठन और पुलिस बल संघ नहीं बना सकते है।
अनुच्छेद 19(1)(घ) - बिना बाधा के घुमने - फिरने की स्वतंन्त्रता ।
अनुच्छेद 19(1)(ड़) -व्यापार या आजिविका कमाने की स्वतन्त्रता।
अनुच्छेद 19(1)(च) - सम्पति अर्जन की स्वतन्त्रता(हटा दिया)
अनुच्छेद 19(1)(छ) - स्थायी रूप से निवास करने की स्वतन्त्रता।
अपवाद - जम्मू - कश्मीर।
अनुच्छेद - 20 अपराधों के दोषसिद्ध के सम्बन्ध में सरंक्षण प्राप्त करने का अधिकार।
अनुच्छेद 20(1) किसी व्यक्ति को तब तक अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाता है जब तक लागु कानुन का उल्लगन न किया हो।
अनुच्छेद 20(2) किसी व्यक्ति के लिए एक अपराध के लिए दण्डित किया जा सकता है।
अनुच्छेद 20(3) किसी व्यक्ति को स्वंय के विरूद्ध गवाही देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 20 और 21 आपातकाल में निलम्बित नहीं किया जाता।
अनुच्छेद - 21 प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का अधिकार।
अनुच्छेद 21(क) 86 वां संविधान संशोधन 2002, 6-14 वर्ष के बालकों को निशुल्क् अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, 1 अप्रैल 2010 से सम्पुर्ण भारत में लागु।
अनुच्छेद - 22 कुछ दशाओं में गिरफ्तारी से संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार, इसमें निवारक ,निरोधक विधि भी शामिल है।
अनुच्छेद 22(1) गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को उसके कारण बताने होंगे।
अनुच्छेद 22(2) उसे वकील से परामर्श प्राप्त करने का अधिकार।
अनुच्छेद 22(3) 24 घंटे में सबंधित न्यायलय में पेश करना होगा - यात्रा व अवकाश का समय शामिल नहीं।
निवारक निरोध विधि के अन्तर्गत - शत्रु देश के नागरिक को गिरफ्तार किया जाता है या ऐसी आशंका ग्रस्त व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जाता है इन्हें उपर के सामान्य (22(1),(2),(3)) अधिकार प्राप्त नहीं है।

शोषण के विरूद्ध अधिकार-अनुच्छेद 23 से अनुच्छेद 24

अनुच्छेद - 23 इसमें मानव का अवैध व्यापार, दास प्रथा, तथा बेगार प्रथा को पूर्णतय प्रतिबन्धित किया गया है। अपवाद - राज्य किसी सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनिवार्य श्रम लागू कर सकता है।
अनुच्छेद - 24 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को उद्योग धन्धों में काम पर नहीं लगाया जाता है। अर्थात् बाल श्रम प्रतिबन्धित किया गया है।
वर्तमान में ऐसी आयु के बालको को घरेलु कार्यो में भी नहीं लगाया जा सकता है।

धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार - अनुच्छेद 25 से 28

अनुच्छेद - 25 अन्तकरण के आधार पर धर्म को मानने की स्वतन्त्रता ।
अनुच्छेद - 26 माने गये धर्म के प्रबंधन करने की स्वतन्त्रता(प्रबन्धन- चल और अचल सम्पति का)।
अनुच्छेद - 27 राज्य किसी धर्म की अभिवृदि पर धार्मिक आधार पर कोई कर नहीं लगायेगा।
अनुच्छेद - 28 सरकारी वित्त पोषित विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा नहीं दि जा सकती है। लकिन किसी विन्यास(ट्रस्ट) द्वारा स्थापित विद्यालय में कुछ प्रावधानों के अन्तर्गत धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है। लेकिन इसमें सभी को बाध्य नहीं किया जा सकता है।

शिक्षा और संस्कृति का अधिकार-अनुच्छेद 29 से अनुच्छेद 30

यह अधिकार अल्पसंख्यक वर्गो को प्राप्त है।
अनुच्छेद - 29 राज्य के अन्तर्गत रहने वाला प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा, लिपी और संस्कृति को सुरक्षित और संरक्षित करने का अधिकार है।
अनुच्छेद - 30 भाषा,लिपी और संस्कृति की सुरक्षा हेतु सभी अल्पसंख्यक वर्गो को अपनी पसन्द की शिक्षण संस्थान की स्थापना करने का अधिकार है ऐसी संस्थाओं में प्रवेश से वंचित नहीं किया जायेगा।

संवैधनिक उपचारों का अधिकार-अनुच्छेद - 32

डा. अम्बेडकर ने इसे संविधान की आत्मा कहा है।
मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु 5 प्रकार कि रिटे जारी करता है ताकि मौलिक अधिकारों को उचित संरक्षण प्रदान किया जा सके।
  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण - हैवस काॅरपस
  2. परमादेश - मैण्डमस
  3. प्रतिषेध - प्रोहिविजन
  4. उत्प्रेषण - सैरिसिरियो
  5. अधिकार पृच्छा - क्यू वारेन्टो
  6. इन रिटो को न्याय का झरना कहा जाता है।
1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण - यह नागरिक अधिकारों की सर्वोत्तम रिट है। बंदी बनाये गये व्यक्ति को 24 घण्टे में न्यायलय बंदी बनाये गये कारणों की समीक्षा करता है।
2. परमादेश - किसी सार्वजनिक पदाधिकारी द्वारा गलत आदेश दिया जाता है तो इसके कारणों की समीक्षा न्यायलय करता है।
3. प्रतिषेध - मना करना - सर्वोच्च न्यायलय अपने अधिनस्थ न्यायलय को सीमा से बाहर जाकर कार्य करने को मना करता है।
4. उत्प्रेषण - ओर अधिक सुचित करना- सर्वोच्च न्यायलय अपने अधिनस्थ न्यायलय से और अधिक सुचना मांगता है।
5. अधिकार पृच्छा - किसी अधिकार से किसी सार्वजनिक पदाधिकारी द्वारा जब कोई पद वैद्य या अवैद्य तरीके से प्राप्त किया जाता है तो उसके कारणों की समीक्षा करता है।
रिट 3 और रिट 4 न्यायलय से न्यायलय में परिवर्तीत कि जाती है।


Sunday, 9 June 2019

राजनीति विज्ञान Political Science in Hindi Part-5

राजनीति विज्ञान Political Science in Hindi Part-5




भारतीय संविधान के अनुच्छेद

अनुच्‍छेद :- विवरण


  • 1:- संघ का नाम और राज्‍य क्षेत्र
  • 2:- नए राज्‍यों का प्रवेश या स्‍थापना
  • 2क:- [निरसन]
  • 3:- नए राज्‍यों का निर्माण और वर्तमान राज्‍यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन
  • 4:- पहली अनुसूची और चौथी अनुसूचियों के संशोधन तथा अनुपूरक, और पारिणामिक विषयों का उपबंध करने के लिए अनुच्‍छेद 2 और अनुच्‍छेद 3 के अधीन बनाई गई विधियां
  • 5:- संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता
  • 6:- पाकिस्‍तान से भारत को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्‍यक्तियों के नागरिकता के अधिकार
  • 7:- पाकिस्‍तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्‍यक्तियों के नागरिकता के अधिकार
  • 8:- भारत के बाहर रहने वाले भारतीय उद्भव के कुछ व्‍यक्तियों के नागरिकता के अधिकार
  • 9:- विदेशी राज्‍य की नागरिकता, स्‍वेच्‍छा से अर्जित करने वाले व्‍यक्तियों का नागरिक न होना
  • 10:- नागरिकता के अधिकारों को बना रहना
  • 11:- संसद द्वारा नागरिकता के अधिकार का विधि द्वारा विनियमन किया जाना
  • 12:- परिभाषा
  • 13:- मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्‍पीकरण करने वाली विधियां
  • 14:- विधि के समक्ष समानता
  • 15:- धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्‍म स्‍थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध
  • 16:- लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता
  • 17:- अस्‍पृश्‍यता का अंत
  • 18:- उपाधियों का अंत
  • 19:- वाक-स्‍वतंत्रता आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण
  • 20:- अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
  • 21:- प्राण और दैहिक स्‍वतंत्रता का संरक्षण
  • 22:- कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
  • 23:- मानव और दुर्व्‍यापार और बलात्श्रम का प्रतिषेध
  • 24:- कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध
  • 25:- अंत:करण की और धर्म की अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्‍वतंत्रता
  • 26:- धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्‍वतंत्रता
  • 27:- किसी विशिष्‍ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्‍वतंत्रता
  • 28:- कुल शिक्षा संस्‍थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्‍वतंत्रता
  • 29:- अल्‍पसंख्‍यक-वर्गों के हितों का संरक्षण
  • 30:- शिक्षा संस्‍थाओं की स्‍थापना और प्रशासन करने का अल्‍पसंख्‍यक-वर्गों का अधिकार
  • 31:- [निरसन]
  • 31क:- संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्‍यावृत्ति
  • 31ख:- कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्‍यकरण
  • 31ग:- कुछ निदेशक तत्‍वों को प्रभाव करने वाली विधियों की व्‍यावृत्ति
  • 31घ:- [निरसन]
  • 32:- इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार
  • 32A:- [निरसन]
  • 33:- इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का बलों आदि को लागू होने में, उपांतरण करने की संसद की शक्ति
  • 34:- जब किसी क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर निर्बन्‍धन
  • 35:- इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने का विधान
  • 36:- परिभाषा
  • 37:- इस भाग में अंतर्विष्‍ट तत्‍वों का लागू होना
  • 38:- राज्‍य लोक कल्‍याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्‍यवस्‍था बनाएगा
  • 39:- समान न्‍याय और नि:शुल्‍क विधिक सहायता
  • 40:- ग्राम पंचायतों का संगठन
  • 41:- कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार
  • 42:- काम की न्‍यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध
  • 43:- कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि
  • 43क:- उद्योगों के प्रबंध में कार्मकारों का भाग लेना
  • 44:- नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता
  • 45:- बालकों के लिए नि:शुल्‍क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध
  • 46:- पोषाहार स्‍तर और जीवन स्‍तर को ऊंचा करने तथा लोक स्‍वास्‍थ्‍य को सुधार करने का राज्‍य का कर्तव्‍य
  • 48:- कृषि और पशुपालन का संगठन
  • 48क:- पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन और वन तथा वन्‍य जीवों की रक्षा
  • 49:- राष्‍ट्रीय महत्‍व के संस्‍मारकों, स्‍थानों और वस्‍तुओं का संरक्षण
  • 50:- कार्यपालिका से न्‍यायपालिका का पृथक्‍करण
  • 51:- अंतरराष्‍ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि
  • 51A:- मूल कर्तव्‍य
  • 52:- भारत के राष्‍ट्रपति
  • 53:- संघ की कार्यपालिका शक्ति
  • 54:- राष्‍टप्रति का निर्वाचन
  • 55:- राष्‍ट्रपति के निर्वाचन की रीति
  • 56:- राष्‍ट्रपति की पदावधि
  • 57:- पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता
  • 58:- राष्‍ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं
  • 59:- राष्‍टप्रति के पद के लिए शर्तें
  • 60:- राष्‍ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
  • 61:- राष्‍ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रकिया
  • 62:- राष्‍ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्‍यक्ति की पदावधि
  • 63:- भारत का उप राष्‍ट्रपति
  • 64:- उप राष्‍ट्रपति का राज्‍य सभा का पदेन सभापति होना
  • 65:- राष्‍ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान या उसकी अनुपस्थिति में उप राष्‍टप्रति का राष्‍ट्रपति के रूप में कार्य करना या उसके कृत्‍यों का निर्वहन
  • 66:- उप राष्‍ट्रपति का निर्वाचन
  • 67:- उप राष्‍ट्रपति की पदावधि
  • 68:- उप राष्‍ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्‍यक्ति की पदावधि
  • 69:- उप राष्‍ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
  • 70:- अन्‍य आकस्मिकताओं में राष्‍ट्रपति के कृत्‍यों का निर्वहन
  • 71:- राष्‍ट्रपति या उप राष्‍ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित या संसक्‍त विषयत
  • 72:- क्षमता आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राष्‍ट्रपति की शक्ति
  • 73:- संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्‍तार
  • 74:- राष्‍ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रि-परिषद
  • 75:- मंत्रियों के बारे में अन्‍य उपबंध
  • 76:- भारत का महान्‍यायवादी
  • 77:- भारत सरकार के कार्य का संचालन
  • 78:- राष्‍ट्रपति को जानकारी देने आदि के संबंध में प्रधानमंत्री के कर्तव्‍य
  • 79:- संसद का गठन
  • 80:- राज्‍य सभा की संरचना
  • 81:- लोक सभा की संरचना
  • 82:- प्रत्‍येक जनगणना के पश्‍चात पुन: समायोजन
  • 83:- संसद के सदनों की अवधि
  • 84:- संसद की सदस्‍यता के लिए अर्हता
  • 85:- संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन
  • 86:- सदनों के अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राष्‍टप्रति का अधिकार
  • 87:- राष्‍ट्रपति का विशेष अभिभाषण
  • 88:- सदनों के बारे में मंत्रियों और महान्‍यायवादी के अधिकार
  • 89:- राज्‍य सभा का सभापति और उप सभापति
  • 90:- उप सभापति का पद रिक्‍त होना, पदत्‍याग और पद से हटाया जाना
  • 91:- सभापति के पद के कर्तव्‍यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उप सभापति या अन्‍य व्‍यक्ति की शक्ति
  • 92:- जब सभापति या उप सभापति को पद से हटाने का कोई संकल्‍प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना
  • 93:- लोक सभा और अध्‍यक्ष और उपाध्‍यक्ष
  • 94:- अध्‍यक्ष और उपाध्‍यक्ष का पद रिक्‍त होना, पद त्‍याग और पद से हटाया जाना
  • 95:- अध्‍यक्ष के पद के कर्तव्‍यों को पालन करने या अध्‍यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्‍यक्ष या अन्‍य व्‍यक्ति की शक्ति
  • 96:- जब अध्‍यक्ष या उपाध्‍यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्‍प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना
  • 97:- सभापति और उप सभापति तथा अध्‍यक्ष और उपाध्‍यक्ष के वेतन और भत्ते
  • 98:- संसद का सचिवालय
  • 99:- सदस्‍यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
  • 100:- सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति सदस्‍यों की निरर्हताएं
  • 101:- स्‍थानों का रिक्‍त होना
  • 102:- सदस्‍यता के लिए निरर्हताएं
  • 103:- सदस्‍यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्‍नों पर विनिश्‍चय
  • 104:- अनुच्‍छेद 99 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से पहले या निरर्हित किए जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति
  • 105:- संसद के सदनों की तथा उनके सदस्‍यों और समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार आदि
  • 106:- सदस्‍यों के वेतन और भत्ते
  • 107:- विधेयकों के पुर: स्‍थापन और पारित किए जाने के संबंध में उपलबंध
  • 108:- कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्‍त बैठक
  • 109:- धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया
  • 111:- विधेयकों पर अनुमति
  • 112 :-वार्षिक वित्तीय विवरण
  • 113:-संसद में प्राक्‍कलनों के संबंध में प्रक्रिया
  • 114:- विनियोग विधेयक
  • 115:- अनुपूरक, अतिरिक्‍त या अधिक अनुदान
  • 116:- लेखानुदान, प्रत्‍ययानुदान और अपवादानुदान
  • 117:- वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध
  • 118:- प्रक्रिया के नियम
  • 119:- संसद में वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन
  • 120:- संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा
  • 121:- संसद में चर्चा पर निर्बंधन
  • 122:- न्‍यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना
  • 123:- संसद के विश्रांतिकाल में अध्‍यादेश प्रख्‍यापित करने की राष्‍ट्रपति की शक्ति
  • 124 :-उच्‍चतम न्‍यायालय की स्‍थापना और गठन
  • 125:- न्‍यायाधीशों के वेतन आदि
  • 126 :-कार्यकारी मुख्‍य न्‍यायमूर्ति की नियुक्ति
  • 127:- तदर्थ न्‍यायाधीशों की नियुक्ति
  • 128:- उच्‍चतम न्‍यायालय की बैठकों में सेवानिवृत्त न्‍यायाधीशों की उपस्थिति
  • 129:- उच्‍चतम न्‍यायालय का अभिलेख न्‍यायालय होना
  • 130:- उच्‍चतम न्‍यायालय का स्‍थान
  • 131:- उच्‍चतम न्‍यायालय की आरंभिक अधिकारिता
  • 132:- कुछ मामलों में उच्‍च न्‍यायालयों से अपीलों में उच्‍चतम न्‍यायालय की अपीली अधिकारिता
  • 133:- उच्‍च न्‍यायालयों में सिविल विषयों से संबंधित अपीलों में उच्‍चतम न्‍यायालय की अपीली अधिकारिता
  • 134क:- उच्‍चतम न्‍यायालय में अपील के लिए प्रमाणपत्र
  • 135:- विद्यमान विधि के अधीन फेडरल न्‍यायालय की अधिकारिता और शक्तियों का उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा प्रयोक्‍तव्‍य होना
  • 136:- अपील के लिए उच्‍चतम न्‍यायालय की विशेष इजाजत
  • 137:- निर्णयों या आदेशों का उच्‍चतम न्‍यायालयों द्वारा पुनर्विलोकन
  • 138:- उच्‍चतम न्‍यायालय की अधिकारिता की वृद्धि
  • 139:- कुछ रिट निकालने की शक्तियों का उच्‍चतम न्‍यायालय को प्रदत्त किया जाना
  • 139क:- कुछ मामलों का अंतरण
  • 140:- उच्‍चतम न्‍यायालय की आनुषंगिक शक्तिया
  • 141:- उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा घोषित विधि का सभी न्‍यायालयों पर आबद्धकर होना
  • 142:- उच्‍चतम न्‍यायालय की डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश
  • 143:- उच्‍चतम न्‍यायालय से परामर्श करने की राष्‍ट्रपति की शक्ति
  • 144:- सिविल और न्‍यायिक प्राधिकारियों द्वारा उच्‍चतम न्‍यायालय
  • 144क:- [निरसन]
  • 145:- न्‍यायालय के नियम आदि
  • 146:- उच्‍चतम न्‍यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्‍यय
  • 147:- निर्वचन
  • 149:- नियंत्रक महा लेखापरीक्षक के कर्तव्‍य और शक्तियां
  • 150:- संघ के और राज्‍यों के लेखाओं का प्ररूप
  • 151:- संपरीक्षा प्रतिवेदन
  • 152:- परिभाषा
  • 153:- राज्‍यों के राज्‍यपाल
  • 154:- राज्‍य की कार्यपालिका शक्ति
  • 155:- राज्‍यपाल की नियुक्ति
  • 156:- राज्‍य की पदावधि
  • 157:- राज्‍यपाल के पद के लिए शर्तें
  • 158:- राज्‍यपाल के पद के लिए शर्तें
  • 160:- कुछ आकस्मिकताओं में राज्‍यपाल के कृत्‍यों का निर्वहन
  • 161:- क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राज्‍यपाल की शक्ति
  • 162:- राज्‍य की कार्यपालिका शक्ति का विस्‍तार
  • 163:- राज्‍यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रि परिषद
  • 164:- मंत्रियों के बारे में अन्‍य उपबंध
  • 165:- राज्‍य का महाधिवक्‍ता
  • 166:- राज्‍य की सरकार के कार्य का संचालन
  • 167:- राज्‍यपाल को जानकारी देने आदि के संबंध में मुख्‍यमंत्री के कर्तव्‍य
  • 168:- राज्‍यों के विधान - मंडलों का गठन
  • 169:- राज्‍यों में विधान परिषदों का उत्‍सादन या सृजन
  • 170:- विधान सभाओं की संरचना
  • 171:- विधान परिषदों की संरचना
  • 172:- राज्‍यों के विधान-मंडलों की अवधि
  • 173:- राज्‍य के विधान-मंडल की सदस्‍यता के लिए अर्हता
  • 174:- राज्‍य के विधान-मंडल के सत्र, सत्रावहसान और विघटन
  • 175:- सदन और सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्‍यपाल का अधिकार
  • 176:- राज्‍यपाल का विशेष अभिभाषण
  • 177:- सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्‍ता के अधिकार
  • 178:- विधान सभा का अध्‍यक्ष और उपाध्‍यक्ष
  • 179:- अध्‍यक्ष और उपाध्‍यक्ष का पद रिक्‍त होना, पदत्‍याग और पद से हटाया जाना
  • 180:- अध्‍यक्ष के पद के कर्तव्‍यों का पालन करने या अध्‍यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्‍यक्ष या अन्‍य व्‍यक्ति की शाक्ति
  • 181:- जब अध्‍यक्ष या उपाध्‍यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्‍प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना
  • 182:- विधान परिषद का सभापति और उप सभापति
  • 183:- सभापति और उप सभापति का पद रिक्‍त होना, पदत्‍याग और पद से हटाया जाना
  • 184:- सभापति के पद के कर्तव्‍यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उप सभापति या अन्‍य व्‍यक्ति की शक्ति
  • 185:- जब सभापति या उप सभापति को पद से हटाने का कोई संकल्‍प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न
होना
  • 186:- अध्‍यक्ष और उपाध्‍यक्ष तथ सभापति और उप सभापति के वेतन और भत्ते
  • 187:- राज्‍य के विधान मंडल का सचिवालय
  • 188:- सदस्‍यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
  • 189:- सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति
  • 190:- स्‍थानों का रिक्‍त होना
  • 191:- सदस्‍यता के लिए निरर्हताएं
  • 192:- सदस्‍यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्‍नों पर विनिश्‍चय
  • 193:- अनुच्‍छेद 188 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञा करने से पहले या अर्हित न होते हुए या निरर्हित किए जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति
  • 194:- विधान-मंडलों के सदनों की तथा सदस्‍यों और समितियों की शक्तियां, विशेषधिकार आदि
  • 195:- सदस्‍यों के वेतन और भत्ते
  • 196:- विधेयकों के पुर: स्‍थापन और पारित किए जाने के संबंध में उपबंध
  • 197:- धन विधेयकों से भिन्‍न विधेयकों के बारे में विधान परिषद की शक्तियों पर निर्बंधन
  • 198:- धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया
  • 199:- "धन विधेयक" की परिभाषा
  • 200:- विधेयकों पर अनुमति
  • 201:- विचार के लिए आरक्षित विधेयक
  • 202:- वार्षिक वित्तीय विवरण
  • 203:- विधान-मंडल में प्राक्‍कलनों के संबंध में प्रक्रिया
  • 204:- विनियोग विधेयक
  • 205:- अनुपूरक, अतिरिक्‍त या अधिक अनुदान
  • 206:- लेखानुदान, प्रत्‍ययानुदान और अपवादानुदान
  • 207:- वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध
  • 208:- प्रक्रिया के नियम
  • 209:- राज्‍य के विधान-मंडल में वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन
  • 210 :-विधान मंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा
  • 211 :-विधान-मंडल में चर्चा पर निर्बंधन
  • 212:- न्‍यायालयों द्वारा विधन मंडल की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना
  • 213:- विधान मंडल के विश्रांतिकाल में अध्‍यादेश प्रख्‍याति करने की राज्‍यपाल की शक्ति
  • 214:- राज्‍यों के लिए उच्‍च न्‍यायालय
  • 215:- उच्‍च न्‍यायालयों का अभिलेख न्‍यायालय होना
  • 216:- उच्‍च न्‍यायालयों का गठन
  • 217:- उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्तें
  • 218:- उच्‍चतम न्‍यायालय से संबंधित कुछ उपबंधों का उच्‍च न्‍यायालयों का लागू होना
  • 219:- उच्‍च न्‍यायालयों के न्‍यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
  • 220:- स्‍थायी न्‍यायाधीश रहने के पश्‍चात विधि-व्‍यवसाय पर निर्बंधन
  • 221:- न्‍यायाधीशों के वेतन आदि
  • 222:- किसी न्‍यायाधीश का एक उच्‍च न्‍यायालय से दूसरे उच्‍च न्‍यायालय को अंतरण
  • 223:- कार्यकारी मुख्‍य न्‍यायमूर्ति की नियुक्ति
  • 224:- अपर और कार्यकारी न्‍यायाधीशों की नियुक्ति
  • 224क:- उच्‍च न्‍यायालयों की बैठकों में सेवानिवृत्त न्‍यायाधीशों की नियुक्ति
  • 225:- विद्यमान उच्‍च न्‍यायालयों की अधिकारिता
  • 226:- कुछ रिट निकालने की उच्‍च न्‍यायालय की शक्ति
  • 226क:- [निरसन]
  • 227:- सभी न्‍यायालयों के अधीक्षण की उच्‍च न्‍यायालय की शक्ति
  • 228:- कुछ मामलों का उच्‍च न्‍यायालय को अंतरण
  • 228क:- [निरसन]
  • 229:- उच्‍च न्‍यायालयों के अधिकारी और सेवक तथा व्‍यय
  • 230:- उच्‍च न्‍यायालयों की अधिकारिता का संघ राज्‍य क्षेत्रों पर विस्‍तार
  • 231:- दो या अधिक राज्‍यों के लिए एक ही उच्‍च न्‍यायालय की स्‍थापना
  • 233:- जिला न्‍यायाधीशों की नियुक्ति
  • 233क:- कुछ जिला न्‍यायाधीशों की नियुक्तियों का और उनके द्वारा किए गए निर्णयों आदि का विधिमान्‍यकरण
  • 234:- न्‍यायिक सेवा में जिला न्‍यायाधीशों से भिन्‍न व्‍यक्तियों की भर्ती
  • 235:- अधीनस्‍थ न्‍यायालयों पर नियंत्रण
  • 236:- निर्वचन
  • 237:- कुछ वर्ग या वर्गों के मजिस्‍ट्रेटों पर इस अध्‍याय के उपबंधों का लागू होना
  • 238:- [निरसन]
  • 239:- संघ राज्‍यक्षेत्रों का प्रशासन
  • 239क:- कुछ संघ राज्‍य क्षेत्रों के लिए स्‍थानीय विधान मंडलों या मं‍त्रि-परिषदों का या दोनों का सृजन
  • 239क :-दिल्‍ली के संबंध में विशेष उपबंध
  • 239कक:- सांविधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध
  • 239कख:- विधान मंडल के विश्रांतिकाल में अध्‍यादेश प्रख्‍यापित करने की प्रशासक की शक्ति
  • 240:- कुछ संघ राज्‍य क्षेत्रों के लिए विनियम बनाने की राष्‍ट्रपति की शक्ति
  • 241:- संघ राज्‍य क्षेत्रों के लिए उच्‍च न्‍यायालय
  • 242:- [निरसन]
  • 243:- परिभाषाएं
  • 243क:- ग्राम सभा
  • 243ख:- पंचायतों का गठन
  • 243ग:- पंचायतों की संरचना
  • 243घ:- स्‍थानों का आरक्षण
  • 243ड:- पंचायतों की अवधि, आदि
  • 243च:- सदस्‍यता के लिए निरर्हताएं
  • 243छ :-पंचायतों की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्‍व
  • 243ज :-पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियां और उनकी निधियां
  • 243-झ :-वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन
  • 243ञ:- पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा
  • 243ट:- पंचायतों के लिए निर्वाचन
  • 243ठ:- संघ राज्‍य क्षेत्रों को लागू होना
  • 243ड:- इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू नह होना
  • 243ढ:- विद्यमान विधियों और पंचायतों का बना रहना
  • 243-ण:- निर्वाचन संबंधी मामलों में न्‍यायालयों के हस्‍तक्षेप का वर्जन
भ
  • 243त:- परिभाषाएं
  • 243थ:- नगरपालिकाओं का गठन
  • 243द:- नगरपालिकाओं की संरचना
  • 243ध:- वार्ड समितियों, आदि का गठन और संरचना
  • 243न:- स्‍थानों का आरक्षण
  • 243प :-नगरपालिकाओं की अवधि, आदि
  • 243फ:- सदस्‍यता के लिए निरर्हताएं
  • 243ब:- नगरपालिकाओं, आदि की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्‍व
  • 243भ:- नगरपालिकाओं द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्ति और उनकी निधियां
  • 243म:- वित्त आयोग
  • 243य:- नगरपालिकाओं के लेखाओं की संपरीक्षा
  • 243यक:- नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन
  • 243यख:- संघ राज्‍यक्षेत्रों को लागू होना
  • 243यग:- इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
  • 243यघ:- जिला योजना के लिए समिति
  • 243यच:- विद्यमान विधियों और नगरपालिकाओं का बना रहना
  • 243यछ:- निर्वाचन संबंधी मामलों में न्‍यायालयों के हस्‍तक्षेप का वर्जन
  • 244:- अनुसूचित क्षेत्रों और जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन.
  • 244क:- असम के कुछ जनजाति क्षेत्रों को समाविष्‍ट करने वाला एक स्‍वशासी राज्‍य बनाना और उसके लिए स्‍थानीय विधान मंडल या मंत्रि परिषद का या दोनों का सृजन.
  • 245 :-संसद द्वारा राज्‍यों के विधान मंडलों द्वारा बनाई गई विधियों का विस्‍तार.
  • 246:- संसद द्वारा और राज्‍य के विधान मंडलों द्वारा बनाई गई विधियों की विषयवस्‍तु.
  • 247:- कुछ अतिरिक्‍त न्‍यायालयों की स्‍थापना का उपबंध करने की संसद की शक्ति.
  • 248:- अवशिष्‍ट विधायी शक्तियां.
  • 249:- राज्‍य सूची में के विषय के संबंध में राष्‍ट्रीय हित में विधि बनाने की संसद की शक्ति.
  • 250:- यदि आपात की उदघोषणा प्रवर्तन में हो तो राज्‍य सूची में के विषय के संबंध में विधि.
  • 251:- संसद द्वारा अनुच्‍छेद 249 और अनुच्‍छेद 250 के अधीन बनाई गई विधियों और राज्‍यों के विधान मंडलों द्वारा बनाई गई विधियों में असंगति.
  • 252:- दो या अधिक राज्‍यों के लिए उनकी सहमति से विधि बनाने की संसद की शक्ति और ऐसी विधि का किसी अन्‍य राज्‍य द्वारा अंगीकार किया जाना.
  • 253:- अंतरराष्‍ट्रीय करारों को प्रभावी करने के लिए विधान.
  • 254:- संसद द्वारा बनाई गई विधियों और राज्‍यों के विधान मंडलों द्वारा बनाई गई विधियों में असंगति.
  • 255:- सिफारिशों और पूर्व मंजूरी के बारे में अपेक्षाओं को केवल प्रक्रिया के विषय मानना.
  • 256:- राज्‍यों की ओर संघ की बाध्‍यता.
  • 257 :-कुछ दशाओं में राज्‍यों पर संघ का नियंत्रण.
  • 257क:- [निरसन]
  • 258:- कुछ दशाओं में राज्‍यों को शक्ति प्रदान करने आदि की संघ की शक्ति.
  • 258क:- संघ को कृत्‍य सौंपने की राज्‍यों की शक्ति.
  • 259:- [निरसन]
  • 260:- भारत के बाहर के राज्‍य क्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता.
  • 261:- सार्वजनिक कार्य, अभिलेख और न्‍यायिक कार्यवाहियां.
  • 262:- अंतरराज्यिक नदियों या नदी दूनों के जल संबंधी विवादों का न्‍यायनिर्णयन.
राज्‍यों के बीच समन्‍वय अनुच्‍छेद विवरण
  • 263:- अंतरराज्‍य परिषद के संबंध में उपबंध.
  • 264:- विधि के प्राधिकार के बिना करों का अधिरोपण न किया जाना.
  • 265:- विधि के प्राधिकार के बिना करों का अधिरोपण न किया जाना.
  • 266:- भारत और राज्‍यों के संचित निधियां और लोक लेखे.
  • 267:- आकस्मिकता निधि.
  • 268:- संघ द्वारा उदगृहीत किए जाने वाले किन्‍तु राज्‍यों द्वारा संगृहीत और विनियोजित किए जाने वाले शुल्‍क.
  • 269:- संघ द्वारा उदगृहीत और संगृहीत किन्‍तु राज्‍यों को सौंपे जाने वाले कर.
  • 270:- उदगृहीत कर और उनका संघ तथा राज्‍यों के बीच वितरण.
  • 271:- कुछ शुल्‍कों और करों पर संघ के प्रयोजनों के लिए अधिभार.
  • 272:- [निरसन]
  • 273:- जूट पर और जूट उत्‍पादों का निर्यात शुल्‍क के स्‍थान पर अनुदान.
  • 274:- ऐसे कराधान पर जिसमें राज्‍य हितबद्ध है, प्रभाव डालने वाले विधेयकों के लिए राष्‍ट्रपति की पूर्व सिफारिश की अपेक्षा.
  • 275:- कुछ राज्‍यों को संघ अनुदान.
  • 276:- वृत्तियों, व्‍यापारों, आजीविकाओं और नियोजनों पर कर.
  • 277:- व्‍यावृत्ति.
  • 278:- [निरसन]
  • 279:- "शुद्ध आगम", आदि की गणना.
  • 280:- वित्त आयोग.
  • 281:- वित्त आयोग की सिफारिशें.
  • 282:- संघ या राज्‍य द्वारा अपने राजस्‍व के लिए जाने वाले व्‍यय.
  • 283:- संचित निधियों, आकस्मिकता निधियों और लोक लेखाओं में जमा धनराशियों की अभिरक्षा आदि.
  • 284:- लोक सेवकों और न्‍यायालयों द्वारा प्राप्‍त वादकर्ताओं की जमा राशियों और अन्‍य धनराशियों की अभिरक्षा.
  • 285:- संघ और संपत्ति को राजय के कराधान से छूट.
  • 286:- माल के क्रय या विक्रय पर कर के अधिरोपण के बारे में निर्बंधन.
  • 288:- जल या विद्युत के संबंध में राज्‍यों द्वारा कराधान से कुछ दशाओं में छूट.
  • 289:- राज्‍यों की संपत्ति और आय को संघ और कराधार से छूट.
  • 290:- कुछ व्‍ययों और पेंशनों के संबंध में समायोजन.
  • 290क:- कुछ देवस्‍वम निधियों की वार्षिक संदाय.
  • 291:- [निरसन]
  • 292:- भारत सरकार द्वारा उधार लेना.
  • 293:- राज्‍यों द्वारा उधार लेना.
  • 294:- कुछ दशाओं में संपत्ति, अ‍ास्तियों, अधिकारों, दायित्‍वों और बाध्‍यताओं का उत्तराधिकार.
  • 295:- अन्‍य दशाओं में संपत्ति, अ‍ास्तियों, अधिकारों, दायित्‍वों और बाध्‍यताओं का उत्तराधिकार.
  • 296:- राजगामी या व्‍यपगत या स्‍वामीवि‍हीन होने से प्रोदभूत संपत्ति.
  • 297:- राज्‍य क्षेत्रीय सागर खण्‍ड या महाद्वीपीय मग्‍नतट भूमि में स्थित मूल्‍यवान चीजों और अनन्‍य आर्थिक क्षेत्र संपत्ति स्रोतों का संघ में निहित होना.
  • 298:- व्‍यापार करने आदि की शक्ति.
  • 299:- संविदाएं.
  • 300:- वाद और कार्यवाहियां.
  • 300क:- विधि के प्राधिकार के बिना व्‍यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना.
  • 301:- व्‍यापार, वाणज्यि और समागम की स्‍वतंत्रता.
  • 302:- व्‍यापार, वाणज्यि और समागम पर निर्बंधन अधिरोपित करने की संसद की शक्ति.
  • 303:- व्‍यापार और वाणिज्‍य के संबंध में संघ और राज्‍यों की विधायी शक्तियों पर निर्बंधन.
  • 304:- राज्‍यों के बीच व्‍यापार, वाणिज्य और समागम पर निर्बंधन.
  • 305:- विद्यमान विधियों और राज्‍य के एकाधिकार का उपबंध करने वाली विधियों की व्‍यावृत्ति.
  • 306:- [निरसन]
  • 307:- अनुच्‍छेद 301 से अनुच्‍छेद 304 के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए प्राधिकारी की नियुक्ति.
  • 308:- निर्वचन.
  • 309:- संघ या राज्‍य की सेवा करने वाले व्‍यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तें.
  • 311:- संघ या राज्‍य के अधीन सिविल हैसियत में नियोजित व्‍यक्तियों का पदच्‍युत किया जाना या पंक्ति में अवनत किया जाना.
  • 312:- अखिल भारतीय सेवाएं.
  • 313:- संक्रमण कालीन उपबंध.
  • 314:- [निरसन]
  • 315:- संघ और राज्‍यों के लिए लोक सेवा आयोग.
  • 316:- सदस्‍यों की नियुक्ति और पदावधि.
  • 318:- आयोग के सदस्‍यों और कर्मचारिवृंद की सेवा की शर्तों के बारे में विनियम बनाने की शक्ति.
  • 319:- आयोग के सदस्‍यों द्वारा ऐसे सदस्‍य न रहने पर पद धारण करने के सबंध में प्रतिषेध.
  • 320:- लोक सेवा आयोगों के कृत्‍य.
  • 321:- लोक सेवा आयोगों के कृत्‍यों का विस्‍तार करने की शक्ति.
  • 322:- लोक सेवा आयोगों के व्‍यय.
  • 323:- लोक सेवा आयोगों के प्रतिवेदन.
  • 323क:- प्रशासनिक अधिकरण.
  • 323ख:- अन्‍य विषयों के लिए अधिकरण.
  • 324:- निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना.
  • 325:- धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्‍यक्ति का निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किए जाने के लिए अपात्र न होना और उसके द्वारा किसी विशेष निर्वाचक-नामावली में सम्मिलित किए जाने का दावा न किया जाना.
  • 326:- लोक सभा और राज्‍यों की विधान सभाओं के लिए निर्वाचनों का वयस्‍क मताधिकार के आधार पर होना.
  • 327:- विधान मंडल के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की संसद की शक्ति.
  • 328:- किसी राज्‍य के विधान मंडल के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की उस विधान मंडल की शक्ति.
  • 329:- निर्वाचन संबंधी मामलों में न्‍यायालयों के हस्‍तक्षेप का वर्जन.
  • 329क:- [निरसन]
  • 330:- लोक सभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्‍थानों का आरक्षण.
  • 331:- लोक सभा में आंग्‍ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्‍व.
  • 332:- राज्‍यों की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्‍थानों का आरक्षण.
  • 333:- राज्‍यों की विधान सभाओं में आंग्‍ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्‍व.
  • 334:- स्‍थानों के आरक्षण और विशेष प्रतिनिधित्‍व का साठ वर्ष के पश्‍चात न रहना.
  • 335:- सेवाओं और पदों के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के दावे.
  • 336:- कुछ सेवाओं में आंग्‍ल भारतीय समुदाय के लिए विशेष उपबंध.
  • 337:- आंग्‍ल भारतीय समुदाय के फायदे के लिए शैक्षिक अनुदान के लिए विशेष उपबंध.
  • 338:- राष्‍ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग.
  • 338क:- राष्‍ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग.
  • 339:- अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्‍याण के बारे में संघ का नियंत्रण.
  • 340:- पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्‍वेषण के लिए आयोग की नियुक्ति.
  • 341:- अनुसूचित जातियां.
  • 342:- अनुसूचित जनजातियां.
  • 343:- संघ की राजभाषा.
  • 344:- राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति
  • 345:- राज्‍य की राजभाषा या राजभाषाएं.
  • 346:- एक राज्‍य और दूसरे राज्‍य के बीच या किसी राज्‍य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा.
  • 347:- एक राज्‍य और दूसरे राज्‍य के बीच या किसी राज्‍य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा.
  • 348:- उच्‍चतम न्‍यायालय और उच्‍च न्‍यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा.
  • 349:- भाषा से संबंधित कुछ विधियां अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया.
  • 350:- व्‍यथा के निवारण के लिए अभ्‍यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा.
  • 350क:- प्राथमिक स्‍तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं.
  • 350ख:- भाषाई अल्‍पसंख्‍यक वर्गों के लिए विशेष अधिकारी.
  • 351:- हिन्‍दी भाषा के विकास के लिए निदेश.
  • 352:- आपात की उदघोषणा.
  • 353:- आपात की उदघोषणा का प्रभाव.
  • 354:- जब आपात की उदघोषणा प्रवर्तन में है तब राजस्‍वों के वितरण संबंधी उपबंधों का लागू होना.
  • 355:- बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्‍य की संरक्षा करने का संघ का कर्तव्‍य
  • 356:- राज्‍यों सांविधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध.
  • 357:- अनुच्‍छेद 356 के अधीन की गई उदघोषणा के अधीन विधायी शाक्तियों का प्रयोग.
  • 358:- आपात के दौरान अनुच्‍छेद 19 के उपबंधों का निलंबन.
  • 359:- आपात के दौरान भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन का निलबंन.
  • 359क:- [निरसन]
  • 360:- वित्तीय आपात के बारे में उपबंध.
  • 361:- राष्‍ट्रपति और राज्‍यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण.
  • 361क:- संसद और राज्‍यों के विधान मंडलों की कार्यवाहियों की प्रकाशन का संरक्षण.
  • 361ख:- लाभप्रद राजनीतिक पद पर नियुक्ति के लिए निरर्हता.
  • 363क:- देशी राज्‍यों के शासकों को दी गई मान्‍यता की समाप्ति और निजी थौलियों का अंत.
  • 364:- महापत्तनों और विमानक्षेत्रों के बारे में विशेष उपबंध.
  • 365:- संघ द्वारा दिए गए निदेशों का अनुपालन करने में या उनको प्रभावी करने में असफलता का प्रभाव.
  • 366:- परिभाषाएं.
  • 367:- निर्वचन.
  • 368:- संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और उसके लिए प्रक्रिया.
  • 369:- राज्‍य सूची के कुछ विषयों के सबंध में विधि बनाने की संसद की इस प्रकार अस्‍थायी शक्ति मानो वे समवर्ती सूची के विषय हों.
  • 370:- जम्‍मू और कश्‍मीर राज्‍य के संबंध में अस्‍थायी उपबंध.
  • 371:- महाराष्‍ट्र और गुजरात राज्‍यों के संबंध में विशेष उपबंध.
  • 371क:- नागालैंड राज्‍य के संबंध में विशेष उपबंध.
  • 371ख:- असम राज्‍य के संबंध में विशेष उपबंध.
  • 371ग:- मणिपुर राज्‍य के संबंध में विशेष उपबंध.
  • 371घ:- आंध्र प्रदेश राज्‍य के संबंध में विशेष उपबंध.
  • 371ड:- आंध्र प्रदेश में केंद्रीय विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना.
  • 371च:- सिक्किम राज्‍य के संबंध में विशेष उपबंध.
  • 371छ:- मिजोरम राज्‍य के संबंध में विशेष उपबंध.
  • 371-झ:- गोवा राज्‍य के संबंध में विशेष उपबंध.
  • 372:- विद्यमान विधियों का प्रवृत्त बने रहना और उनका अनुकूलन.
  • 372क:- विधियों का अनुकूलन करने की राष्‍ट्रपति की शक्ति.
  • 373:- निवारक निरोध में रखे गए व्‍यक्तियों के संबंध में कुछ दशाओं में आदेश करने की राष्‍ट्रपति की शाक्ति.
  • 374:- फेडरल न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों और फेडरल न्‍यायालय में या सपरिषद हिज मेजेस्‍टी के समक्ष लंबित कार्यवाहियों के बारे में उपबंध.
  • 375:- संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए न्‍यायालयों, प्राधिकारियों और अधिकारियों का कृत्‍य करते रहना.
  • 376:- उच्‍च न्‍यायालयों के न्‍यायाधीशों के बारे में उपबंध.
  • 377:- भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक के बारे में उपबंध.
  • 378:- लोक सेवा आयोगों के बारे में उपबंध.
  • 378क:- आंध्र प्रदेश विधान सभा की अवधि के बारे में विशेष उपबंध.
  • 379-391:- [निरसन]
  • 392 :-कठिनाइयों को दूर करने की राष्‍ष्‍ट्रपति की शक्ति.
  • 393:- संक्षिप्‍त नाम.
  • 394:- प्रारंभ.
  • 394क :-हिन्‍दी भाषा में प्राधिकृत पाठ
  • 395 :- निरसन.